छत्तीसगढ़ कलचुरी वंश सामान्य ज्ञान: परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

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On: June 24, 2026
CG Kalchuri Vansh GK
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CG Kalchuri Vansh History GK IMP : छत्तीसगढ़ का कलचुरी राजवंश: इतिहास, प्रमुख शासक से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य और साक्ष्य

प्रारंभिक विवरण

  • भारत के इतिहास में कल्चुरि वंश का स्थान महत्वपूर्ण है। यह वंश लगभग 1200 वर्षों की अवधि (550-1745 ई.) तक भारत के किसी न किसी क्षेत्र में शासन करने वाला वंश था।
  • कृष्णराज (500-575 ई.) को कल्चुरि वंश का मूल पुरूष माना जाता है ।
  • वामराज देव त्रिपुरी के कल्चुरि वंश के वास्तविक संस्थापक माने जाते है।
  • हैहय वंशीय का पूरा वृत्तांत पुराणों में मिलता है। यह स्वयं को सहस्त्रार्जुन कह कर पुकारते थे।

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प्रारंभिक साक्ष्य विवरण

  • त्रिपुरी को स्थायी रूप से राजधानी बनाने का श्रेय कोकल्ल देव प्रथम ( 875-900ई.) को जाता है। इनके विजयों का उल्लेख ‘बिलहरी लेख में मिलता है।
  • प्राचीन समय में यह वंश कटच्चुरि, कलत्सूरि, कलचुरि या कालाचुरि के नाम से जाने जाते थे।
  • चंदरबरदाई की रचना ‘पृथ्वीराज रासो’ में उन्हें विदेशी माना गया है।
  • कल्चुरियों ने अपने शासनकाल में कालांजर, प्रयाग, त्रिपुरी, काशी, तुम्माण, रतनपुर, खल्लारी एवं रायपुर नामक स्थानों को राजधानी के रूप में स्थापित कर शासन किया।

रतनपुर आगमन

  • शंकरगण द्वितीय ‘मुग्धतुंग’ (900-925 ई.) को त्रिपुरी की राजगद्दी प्राप्त हुई। शंकरगण द्वितीय ने बाणवंशीय शासक को पराजित करके तुम्माण पर अधिकार कर अपने भाइयों को मण्डलाधिपति बनाया।
  • कालांतर में सोमवंशियों ने इस क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया। इस समय लक्ष्मणराज त्रिपुरी के शासक थे, जिन्होंने अपने पुत्र कलिंगराज को तुम्माण पर अधिकार करने हेतु भेजा।
  • कलिंगराज ने लगभग 1000 ई. में तुम्माण पर अधिकार कर कल्चुरियों की वास्तविक सत्ता का संचालन प्रारंभ किया। कलिंगराज को छत्तीसगढ़ में कल्चुरि वंश का वास्तविक संस्थापक मानते है।

रतनपुर के कल्चुरि शासक

कलिंगराज ( 1000 -1020ई.)

  • रतनपुर के कल्चुरि शासक बिलहरि (जबलपुर) से प्राप्त अभिलेख प्रमुख साक्ष्य है।
  • त्रिपुरी के शासक लक्ष्मणराज के पुत्र कलिंगराज ने 1000 ई. के लगभग सोमवंशियों को सत्ताच्युत कर कल्चुरि वंश की सत्ता स्थापित की।
  • इन्होंने तुम्माण को राजधानी बनाकर 1000-1020 ई. तक शासन किया।

कमलराज (1020-1045ई.)

  • कलिंगराज का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कमलराज लगभग 1020 ई. में राजा हुआ।
  • त्रिपुरी के राजा गांगेयदेव द्वारा ओड़िशा पर आक्रमण के अवसर पर कमलराज ने उसकी सहायता की थी ।

रत्नदेव अथवा रत्नराज प्रथम ( 1045-1065 ई.)

  • कमलराज का उत्तराधिकारी रत्नदेव प्रथम हुआ। इसका विवाह कोमोमण्डल के अधिपति वज्जूक या वजूवर्मा की पुत्री नोनल्ला हुआ था।
  • इस सम्बन्ध के कारण कल्चुरियों की स्थिति मजबूत हो गई। रत्नदेव प्रथम के काल में अनेक निर्माण कार्य तुम्माण में किए गए।
  • इन्होने लगभग 1050 ई. में रत्नपुर नामक नगर स्थापना कर राजधानी तुम्माण से यहां स्थानान्तरित की ।
  • रत्नपुर (वर्तमान में रतनपुर) के नाम पर कल्चुरियों के दक्षिण कोसल की इस शाखा को इतिहासकारों द्वारा रतनपुर के कल्चुरि के नाम से सम्बोधित किया जाता है।
  • रत्नदेव ने नवीन राजधानी में अनेक मंदिरों एवं तालाबों का निर्माण कराया।
  • प्रसिद्ध महामाया मंदिर का निर्माण इन्हीं के द्वारा कराया गया। रतनपुर को ‘कुबेरपुर की उपमा दी गई और उसका महत्व अधिक बढ़ गया।

पृथ्वीदेव प्रथम (1065-1095 ई.)

  • रत्नदेव प्रथम के पश्चात उसका पुत्र पृथ्वीदेव प्रथम राजा बना।
  • इसकी सर्वप्रथम तिथि रायपुर ताम्रपत्र से कल्चुरि संवत् 821 अर्थात् 1095 ई. ज्ञात होती है।
  • इन्होने ‘सकलकोसलाधिपति की उपाधि धारण की थी तथा वह कोसल के इक्कीस हजार ग्रामों की अधिपति था।
  • इनके काल में तुम्माण एवं रतनपुर में निर्माण कार्य होते रहे।

जाजल्लदेव प्रथम (1095-1120 ई.)

  1. जाजल्लदेव प्रथम अपने पिता पृथ्वीदेव प्रथम के पश्चात लगभग 1095 ई. में रतनपुर का राजा हुआ ।
  2. इनके रतनपुर शिलालेख में इसकी विजयों का उल्लेख है। इसने वैरागर, लॉजिका, भाणर, तलहारिमण्डल, दण्डकपुर (बंगाल में स्थित) खिमिडी (आंध्र में स्थित ) को पराजित किया।
  3. नन्दावली एवं कुक्कुट के राजा इसकी अधिसत्ता स्वीकार कर इसे कर देते थे।
  4. जाजल्लदेव ने चक्रकोट के छिंदक नागवंशी राजा सोमेश्वर को दण्ड देने के उद्देश्य से उसकी राजधानी को जला दिया तथा उसे मंत्रियों तथा रानियों सहित कैद कर लिया, किन्तु उसकी माता के अनुरोध पर मुक्त कर दिया।
  5. इन्होने सुवर्णपुर के भुजबल को पराजित कर कैद किया था । इस प्रकार इसकी प्रतिष्ठा और कीर्ति में वृद्धि हुई।
  6. इसने अपने नाम पर स्वर्ण मुद्राएं प्रचलित करायीं ।
  7. इन्होने जाजल्लपुर नगर (वर्तमान में जांजगीर) की स्थापना की तथा पाली के शिव मंदिर का जीर्णोद्वार कराया जो आज भी सुरक्षित है।
  8. इन्होने अपने स्वर्ण सिक्कों पर ‘श्रीमज्जाजल्यदेव’ एवं ‘गजशार्दूल’ चित्रित करवाया।

रतनदेव द्वितीय ( 1120-1135 ई.)

  1. जाजल्लदेव प्रथम के पश्चात रत्नदेव द्वितीय कल्चुरि संवत् 878 में राजा हुआ ।
  2. इन्होने त्रिपुरी के कल्चुरियों की अधिसत्त की अधिसत्ता मानना अस्वीकार कर दिया। अतः त्रिपुरी के राजा गयाकर्ण ने इन पर आक्रमण किया परन्तु यह असफल रहा।
  3. इन्ही के समय गंगवंशी राजा अनन्त वर्मा चोड़गंग ने भी रतनपुर के कल्चुरि राज्य पर आक्रमण किया, किन्तु शिवरीनारायण के पास हुए युद्ध में उसे पराजित हो कर लौटना पड़ा।
  4. इनके पश्चात जाजल्लदेव ने गौड़ देश पर आक्रमण कर वहां के राजा को पराजित किया ।

पृथ्वीदेव द्वितीय ( 1135-1165 ई.)

  1. रत्नदेव द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका पुत्र पृथ्वीदेव द्वितीय हुआ ।
  2. इनका सर्वप्रथम अभिलेख कल्चुरि संवत् 890 अर्थात 1138 ई. का है।
  3. इनके काल में रतनपुर का कल्चुरि साम्राज्य अत्यन्त विस्तृत हो गया था।
  4. इनके राजिम शिलालेख से ज्ञात होता है कि इसके सेनापति जगपाल ने सरहागढ़, मचका, सिहावा, भ्रमरवद्र, कान्तार, कुसुमभोग, कान्दाडोंगर तथा काकरय के क्षेत्रों को जीतकर साम्राज्य का विस्तार किया।
  5. इनके पश्चात इसने चक्रकोट पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया।
  6. इससे अनन्तवर्मा चोड़गंग भयभीत होकर समुद्र तट भागा अनन्तवर्मा की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र मधुकामार्णव जटेश्वर जो पृथ्वीदेव द्वितीय के द्वारा पराजित कर कैद किया गया।
  7. इनका अंतिम रतनपुर अभिलेख कल्चुरि संवत् 915 अर्थात 1163 ई. का है।

जाजल्लदेव द्वितीय ( 1165 – 1178 ई.)

  • रतनपुर के सिंहासन पर जाजल्लदेव द्वितीय अपने पिता पृथ्वीदेव द्वितीय के पश्चात बैठा। इसकी सर्वप्रथम ज्ञात तिथि मल्हार शिलालेख कल्चुरि संवत् 919 अर्थात 1167 ई. से मिलती है।
  • त्रिपुरी के कल्चुरि राजा जयसिंह ने आक्रमण किया, किन्तु वह असफल रहा। इस शासक का राज्य अल्पकालीन था।
  • जाजल्लदेव द्वितीय के बाद उसके बड़े भाई जगदेव के राजा बनने का विवरण रत्नदेव के खरौद शिलालेख में मिलता है।

रत्नदेव तृतीय ( 1178-1198 ई.)

  • जाजल्लदेव के पश्चात उसके पुत्र रत्नदेव तृतीय के विषय में उसके कल्चुरि संवत् 933 के अर्थात 1168 ई. के खरौद शिलालेख से जानकारी मिलती है। यह जगदेव की रानी सोमल्ला का पुत्र था ।
  • इनके काल में अराजक स्थिति निर्मित हो गई थी। इससे निपटने हेतु उसने एक ब्राम्हण गंगाधर को प्रधानमंत्री बनाया, गंगाधर ने खरौद के लखनेश्वर मंदिर के सभी मंडपों का जीर्णोद्वार कराया।

प्रतापमल्ल ( 1198-1222 ई.)

  • इनके तीन ताम्रपत्र पेन्ड्राबंध, कोनारी एवं बिलाईगढ़ नामक स्थानों से क्रमश: 1213, 1216 एवं 1217 ई. (संवत् 965, 968 एवं 969) के प्राप्त हुए है। इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि यह कम उम्र में भी अत्यन्त शक्तिवान था।
  • इनके तांबे के चक्राकर एवं शटकोंणाकार सिक्के मिले है, जिसमें सिंह और कटार की आकृति मिलती है। · इन्ही के काल में जसराज अथवा यशोराज नामक एक कल्चुरियों का सामन्त हुआ। ·
  • इसका उल्लेख बोरिया (कवर्धा के निकट) मूर्तिलेख, कल्चुरि संवत् 910 तथा सहसपुर के सहस्त्रबाहु प्रतिमा (कल्चुरि संवत् 934) लेख में मिलता है।

वाहरेन्द्र अथवा बाहरसाय ( 1480-1525 ई.)

  1. इनके बाद लम्बे अंतराल के पश्चात बाहरेन्द्र ( बाहरसाय, सम्भवतः 1480-1525 ई.) नामक राजा के विषय में जानकारी मिलती है।
  2. इनका एक शिलालेख रतनपुर के विक्रम संवत् 1552 (1495-96 ई.) तथा दो शिलालेख कोसंगई से प्राप्त हुए है, जिसमें एक विक्रम संवत् 1570 अर्थात 1513 ई. का है, दूसरा तिथिविहीन है।
  3. बाहरेन्द्र के अभिलेख से उसके पूर्ववर्ती अनेक राजाओं के नाम मिलते है।
  4. इसमें सिंघण तथा उसके पश्चात् क्रमशः डंधीर, मदनब्रम्हा, रामचन्द्र तथा रत्नदेव के नामोल्लेख है।
  5. वाहरेन्द्र रत्नदेव का पुत्र था। बाहरेन्द्र के काल में राजधानी रतनपुर से कोसंगा (कोसंगई गढ़ वर्तमान छुरी) स्थानान्तरित कर दी गई थी। इसके शासन काल में पठानों का आक्रमण हुआ था तथा इसने उन्हें सोन नदी तक खदेड़ दिया था।

कल्याण साय ( 1544 – 1581 ई.)

  1. बाहरेन्द्र के पश्चात रतनपुर के कल्चुरियों के अभिलेख नहीं मिलते, किन्तु अन्य साक्ष्यों से जानकारी मिलती है कि कल्याणसाय नामक एक राजा ने रतनपुर में लगभग 1544 से 1581 तक (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 1536-1573 ई. तक) राज्य किया ।
  2. इसके समय की एक राजस्व पुस्तिका का उल्लेख मिलता है, जिसमें उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व एवं सैन्य बल की जानकारी मिलती है।
  3. मिस्टर चिश्म बिलासपुर के प्रथम अंग्रेज बंदोबस्त अधिकारी ने सन् 1868 में इस पुस्तिका को आधार मानकर कल्चुरि शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है।
  4. बंदोबस्त पुस्तिका के आधार पर ही चिश्म ने रतनपुर और रायपुर के 18-18 गढ़ों अर्थात कुल छत्तीसगढ़ों के प्रशासन का उल्लेख किया है।
  5. कल्याण साय मुगल सम्राट अकबर का समकालीन था तथा उसके दरबार में लगभग आठ वर्ष रहा और वहां से अनेक प्रकार के सम्मान एवं सनद आदि लेकर लौटा ।
  6. इस समय सम्पूर्ण राज्य से होने वाली वार्षिक आय 6.50 लाख रु. थी ।

राजसिंह (1689-1712 ई.)

  • इसने राजपुर (वर्तमान जूना शहर रतनपुर के निकट) बसाया ।
  • प्रसिद्ध कवि गोपाल (गोपाल चन्द्र मिश्र) राजसिंह के राजाश्रय में थे, जिन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘खूब तमाशा’ लिखा था।
  • इस रचना में राजसिंह के विषय में जानकारी के साथ – साथ औरंगजेब की आलोचना मिलती है।
  • राजसिंह ने अपने नाम पर राजपुर नगर बसाया जो वर्तमान में रतनपुर का जूनाशहर के नाम से जाना जाता है।
  • राजसिंह ने रतनपुर में हवा महल एवं बादल महल का निर्माण कराया ।
  • राजसिंह ने अपने भाई मोहन सिंह की अनुपस्थिति के कारण सत्ता अपने चाचा सरदार सिंह को दे दिया ।

रघुनाथ सिंह (1732-1745 ई.)

  • भोसला शासक रघुजी प्रथम के सेनापति भास्करपंत ने सन् 1741 में रतनपुर पर आक्रमण कर दिया।
  • कल्चुरि शासक रघुनाथ सिंह वृद्ध शासक होने एवं पुत्र वियोग के कारण बिना युद्ध किये मराठों के अधीन आत्मसमर्पण कर दिया।
  • इस प्रकार कल्चुरि राजवंश का आधिपत्य समाप्त हो गया और रघुनाथ सिंह मराठों का करद् शासक बन गया।
  • भास्कर पंत ने मराठा प्रतिनिधि के रूप में रतनपुर क्षेत्र में कल्याण गिरि गुंसाई की नियुक्ति की ।

मोहन सिंह (1745-1758 ई.)

  • मराठों के अधीन रतनपुर कल्चुरि के करद् शासक थे।
  • सन् 1758 में भोसला राजकुमार बिंबाजी ने रतनपुर में प्रत्यक्ष मराठा शासन स्थापित किया।

रायपुर के कल्चुरि शासक

रतनपुर के कल्चुरियों की लहुरि शाखा लगभग 14वीं शताब्दी ई. में रायपुर में स्थापित हुई, इस शाखा के राजा ब्रह्मदेव के दो शिलालेख रायपुर तथा खल्लारी से प्राप्त हुए है ।

  • इन अभिलेखों में लक्ष्मीदेव के पुत्र सिंघण तथा सिंघण के पुत्र रामचन्द्र का उल्लेख मिलता है।
  • इसमें सिंघण द्वारा 18 गढ़ों को विजित करने का उल्लेख है।

लक्ष्मीदेव ( 1300-40 ई.)

  • मल्हार शिलालेख के अनुसार कल्चुरियों के रायपुर शाखा के संस्थापक लक्ष्मीदेव को माना जाता है।
  • इन्होंने संभवतः खल्लारी को राजधानी बनाकर शासन संचालित किया ।

रामचंद्र देव ( 1380-1400 ई.)

  • खल्लारी अभिलेख अनुसार रामचंद्र देव ने नागवंश के राजा भाणिंग देव को पराजित किया था ।
  • इन्होंने अपने पुत्र ब्रह्मदेव राय के नाम पर रायपुर नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाई ।
  • इस प्रकार रामचंद्र देव रायपुर से शासन करने वाले प्रथम कल्चुरि शासक है।

ब्रह्मदेव राय (1400-200 ई.)

  • रामचंद्र देव के मृत्युपरांत उनके पुत्र ब्रह्मदेव राय ने शासन सम्भाला।
  • यह संगीत विद्या में निपुण थे अतः इन्हें पंडितों में वाक्पति एवं द्वितीय भारत की संज्ञा दी जाती है।
  • सैन्य कारणों से इन्होंने खल्लारी को अपनी द्वितीय राजधानी घोषित की थी।
  • खल्लारी अभिलेख से ज्ञात होता है कि इनके काल में देवपाल नामक मोची ने खल्लारी में नारायण मंदिर का निर्माण करवाये थे।

अमर सिंह (1741-53 ई.)

  • यह रायपुर शाखा के अंतिम शासक माने जाते है । इन्हें 1750 ई. में मराठों ने बिना किसी विरोध के राजच्युत कर दिया और रायपुर की गद्दी छिन ली।
  • अमर सिंह को रायपुर, राजिम व पाटन के परगने देकर 7000 हजार रु. वार्षिक टकोली निश्चित कर दी गई।

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