छत्तीसगढ़ आदिवासी विद्रोह सामान्य ज्ञान

|
On: June 22, 2026
cg me kitne adivasi vidroh samanya gyan
Join WhatsApp
Join Now

छत्तीसगढ़ के आदिवासी विद्रोह: इतिहास और सामान्य ज्ञान से vyapam पुलिस cgpsc मेंस एग्जाम में प्रश्न पूछे जाते है

छत्तीसगढ़ में आदिवासी विद्रोह बस्तर के आदिवासी आरम्भ से ही स्वतंत्रता प्रेमी रहे हैं, किन्तु उनके सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में हस्तक्षेप ने उन्हें विद्रोह हेतु विवश किया।

मराठों और अंग्रेजों ने उन पर हर तरह से अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न किया, जिससे असंतुष्ट आदिवासियों ने इनके द्वारा अपने चरम शोषण के विरूद्ध आवाज उठाई गई, जिसे अंग्रेजों और मराठों ने विद्रोह की संज्ञा दी थी।

छत्तीसगढ़ करेंट अफेयर्स 2026 – CLICK HERE

हल्बा विद्रोह (1774-77 ई.)

  • राजा दलपतदेव (1731-74 ई.) का शासनकाल शुख समृद्धि का काल था किन्तु इनकी मृत्यु के पश्चात पटरानी के पुत्र अजमेर सिंह तथा बड़ी रानी के पुत्र बड़े भाई दरियावदेव के मध्य उत्तराधिकार हेतु संघर्ष हुआ ।
  • कारण – परिणाम राजा दलपत देव द्वारा अजमेर सिंह को उत्तराधिकारी नियुक्त किया जाना किन्तु भाई दरियावदेव का राजसत्ता हेतु लोभी होना एक बड़े विद्रोह को जन्म दिया ।

गतिविधि

  1. अपने लोभ को पुरा करने के लिए दरियावदेव ने जैपुर के राजा विक्रमदेव (1758-81 ई.) से मित्रता कर उसके माध् यम से नागपुर के भोंसले व अंग्रेजों से गुप्त संधि कर अजमेर सिंह के विरूद्ध युद्ध छेड़ दिया।
  2. 1777 ई. में कम्पनी शासन के अधिकारी जॉनसन व जैपुर की सेना ने पूर्व से व भोंसला सेना उत्तर से जगदलपुर को घेर लिया। अजमेर सिंह परास्त हो जगदलपुर से भाग गया और दरियावदेव सिंहासन पर बैठा।
  3. दरियावदेव जो जैपुर राजा की शरण में था, ने जैपुर से 1777 ई. में संधि की, जिसके अनुसार बस्तर के पांच गढ़ों कोटपाड़, चुरूमुंडा, पोड़ागढ़, ओमरकोट और रायगढ़ को अजमेर सिंह के विरूद्ध सैन्य सहायता के बदले देना होगा ।
  4. उसने त्रयंबक अवीर राव के सामने बिम्बाजी भोंसला के पक्ष में संधि पत्र पर हस्ताक्षर किये, जिसके अनुसार यदि वह पुनः राज्य पाएगा तो बस्तर मराठा साम्राज्य का अंग हो जाएगा।
  5. अजमेर सिंह डोंगर पहुंचकर वहां पुनः विद्रोहियों को एकजुट करने लगा, किन्तु दरियावदेव ने उनका पीछा किया और एक घमासान युद्ध के पश्चात अजमेर सिंह मारा गया।

परिणाम

  • सन् 1776 ई. में अजमेर सिंह की मृत्यु के पश्चात हल्बा सेना का बर्बरतापूर्वक कत्लेआम के साथ समस्त हल्बाओं को कुटिलता से मार डाला गया। केवल एक हल्बा अपनी जान बचा सका।
  • इतना बड़ा नरसंहार पूरे विश्व में कहीं नहीं हुआ, जिसमें पूरी जाति का सफाया कर दिया गया हो। अजमेर सिंह की मृत्यु और हल्बा क्रांति के पतन को बस्तर में ‘चालुक्य राज’ का पतन माना जाता है।
  • मराठा, अंग्रेजों व जैपुर राज्य के बोझ से दबे दरियादेव ने 1778 ई. में कोटपाड़ संधि कर भोंसलों की अधीनता स्वीकार कर ली और उनका करद राज्य बन गया ।

भोपालपट्टनम संघर्ष (1795 ई.)

  1. भोपालपट्टनम संघर्ष कोई युद्ध अथवा विद्रोह नहीं था, अपितु यह दक्षिण बस्तर के गोड़ों द्वारा अप्रैल 1795 ई. में कैप्टन ब्लंट के बस्तर में इन्द्रावती पारकर भोपालपट्टनम जाने के प्रयास में उन्हें रोकने हेतु हमला था
  2. ब्लंट को जमींदारी के राजा के यहां पहुंचना था, किन्तु यहां के दुर्धष आदिवासियों ने ब्लंट से संघर्ष किया।
  3. ब्लंट ने कुछ बंजारों को दुभाषिये व मार्गदर्शक के रूप में पकड़ रखा था, किन्तु गोंड़ों ने वार्तालाप के पश्चात भी उन्हें इन्द्रावती पारकर बस्तर में प्रवेश नहीं करने दिया और ब्लंट को वापस आना पड़ा।

परलकोट का विद्रोह (1824-25 ई.)

  1. बस्तर राज्य के उत्तर-पश्चिम में स्थित परलकोट सबसे पुरानी जमींदारी थी।
  2. परलकोट तीन नदियों कोटरी, निबरा और गुडरा के संगम पर स्थित है।
  3. परलकोट के जमींदार अपने को सूर्यवंशी राजपूत मानते थे और उनकी उपाधि ‘भुमिया’ राजा की थी।

कारण

  • परिणाम 1824 ई. में गेंदसिंह इस जमींदारी का जमींदार था। इन दिनों महिपालदेव बस्तर का राजा था।
  • परलकोट में मराठों और ब्रिटिश अधिकारियों की उपस्थिति से अबूझमाड़ियों की अपनी पहचान का खतरा उत्पन्न हो गया था। विदेश की सभ्यता से अबूझमाड़िया खतरा महसूस करने लगे थे।
  • मराठों और अंग्रेजों की शोषण नीति से अबूझमाड़िया तंग बस्तर का राजा था।

गतिविधि

  • गेंद सिंह के आह्वान पर अबुझमाड़िया आदिवासी 24 दिसम्बर, 1824 ई. को परलकोट में एकत्रित होने लगे। क्रांतिकारी 4 जनवरी, 1825 ई. तक अबूझमाड़ से चांदा तक छा गए ।
  • विद्रोहियों ने सर्वप्रथम मराठों को रसद की पूर्ति करने वाले बंजारों को लूटा और मराठा तथा अंग्रेज अधिकारियों पर घात लगाना प्रारम्भ कर दिया।
  • क्रांतिकारी धावड़ा-वृक्ष की टहनियों को विद्रोह के संकेत के रूप में प्रयोग किया गया। छत्तीसगढ़ के अधीक्षक मि. एगन्यू की पहल पर 4 जनवरी, 1825 ई. को चांदा के पुलिस अधीक्षक कैप्टन पेव के नेतृत्व में एक सेना विद्रोहियों का दमन करने के लिए परलकोट में बुलवाई गई।

परिणाम

  • मराठों और अंग्रेजों की सेना ने 10 जनवरी, 1825 ई. को परलकोट को घेर लिया। गेंद सिंह गिरफ्तार कर लिए गए। गेंद सिंह और उनके साथियों पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया।
  • 20 जनवरी, 1825 ई. को गेंद सिंह को उसके महल के सामने अंग्रेजों ने फांसी दे दी। गेंद सिंह का बलिदान बस्तर भूमि की मुक्ति के लिये एक अविस्मरणीय मिसाल और अध्याय है।
  • गेंद सिंह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बस्तर का ही नहीं वरन सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का प्रथम शहीद माना जाना चाहिए।

तारापुर विद्रोह (1842-1854 ई.)

  • बस्तर राज्य के मुख्यालय जगदलपुर से 80 किमी. दक्षिण-पश्चिम में तारापुर का परगना था। उन दिनों भूपालदेव बस्तर के राजा थे।
  • राजा भूपालदेव का भाई दलगंजन सिंह तारापुर परगने का प्रशासक था।

कारण – बस्तर के राजा ने नागपुर सरकार के आदेश पर तारापुर परगने के कर को बढ़ा दिया था। तारापुर के लोग पूर्व से ही मराठों की रसद पूर्ति में सहायक बंजारों से नाराज थे, क्योंकि उन्होंने उनकी जीवन शैली को भंग कर दिया था।

गतिविधि

  • नए कर से आदिवासी बड़े परेशान थे। दलगंजन सिंह, मांझी और आदिवासी नए लगान के कारण उत्तेजित हो उठे। उन्होंने दीवान जगबंधु को पद से हटाने और कर को वापस लेने के लिए विद्रोह किया।
  • तारापुर के आदिवासियों ने एक दिन दीवान जगबंधु को कैद कर लिया। राजा भूपालदेव के हस्तक्षेप के बाद दलगंजन सिंह ने दीवान को मुक्त कर दिय। दीवान की मुक्ति से आदिवासी नाराज हो उठे।
  • दीवान ने नागपुर की सेना के सहयोग से आदिवासियों को परास्त किया । दलगंजन सिंह को गिरफ्तार कर नागपुर जेल भेज दिया गया। नागपुर जेल में दलगंजन सिंह को छः माह तक रखा गया।

परिणाम

  • नागपुर के रेजीडेंट मेजर विलयम्स ने तारापुर के आदिवासियों के असंतोष को दूर करने जगबंधु को दीवानी के पद से हटा दिया और नए कर को वापस ले लिया ।
  • तारापुर का विद्रोह बस्तर के इतिहास मे विशेष महत्व रखता है। नया कर तो विद्रोह का एक कारण था ही, किन्तु प्रमुख कारण अंग्रेजों द्वारा आदिवासियों के परम्परागत जीवन व नियमों में हस्तक्षेप करना था ।

संभावित प्रश्न छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश शासन के प्रारंभिक चरण में किए गए सुधार कार्य पर लेख लिखिए । (शब्द सीमा – 100)

  1. कोई विद्रोह में नागुल दोरला का योगदान समझाइए । ( शब्द सीमा – 100)
  2. भूमकाल विद्रोह का कारण बताइए । ( शब्द सीमा – 100)
  3. कल्चुरि कालीन प्रशासन व्यवस्था को विस्तृत रूप से समझाइए । ( शब्द सीमा-175)
  4. कल्चुरि कालीन व्यवस्था को निम्न बिन्दुओं के आधार पर समझाइए | ( शब्द सीमा-175)
  5. अ. सामाजिक स्थिति ब. आर्थिक स्थिति स. धार्मिक स्थिति द. स्थापत्य एवं शिल्प

यदि आपका कोई सवाल है निचे कमेन्ट करे

Leave a Comment