Chhattisgarh kakatiya vansh से CGPSC Vyapam पुलिस exam में प्रश्न पूछे जाते है
- काकतीय वंश – प्रारंभिक विवरण बस्तर क्षेत्र में छिंदक नागवंशीय शासक हरिशचन्द्र देव को पराजित कर अन्नमदेव ने काकतीय वंश स्थापित किया ।
- बस्तर की जनजाति परम्परा के अनुसार काकतीय वंश को चालकी वंश एवं कुम्हड़ा फलिमा राजवंश नाम से संबोधित किया जाता है।
- अन्नमदेव के वारंगल परित्याग के सम्बन्ध में विद्वानों ने विचारधारा प्रस्तुत की है। मुसलमानों के आक्रमण के समय वह वारंगल से खदेड़ दिया गया था।
- अन्नमदेव द्वारा बारसूर में काकतीय वंश की स्थापना के पश्चात् इनके वंशजों ने 1936 ई. तक 613 वर्षों तक राज किया।
महत्वपूर्ण तथ्य
- शासनकाल 1324-1947 ई.
- आदिपुरुष – प्रतापरुद्रदेव
- संस्थापक – अन्नमदेव
- आरंभिक राजधानी – मंधोता
- प्रमुख राजधानी – बस्तर, जगदलपुर, बारसूर, राजपुर
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काकतीय वंशीय प्रमुख शासक
- अन्नमदेव (1324-69 ई.) अन्नमदेव को दंतेवाड़ा अभिलेख में ‘अन्नमराज कहा गया है, जो प्रतापरूद्रदेव का अनुज थे एवं 1324 ई. में वारंगल छोड़कर बस्तर पहुंचे थे।
- इन्होने बस्तर में लघु राज्यों के राजाओं को पराजित किया व समूचे बस्तर का अधिपति बन गया ।
- इस प्रकार अन्नमदेव उत्तर-मध्ययुगीन बस्तर के शासन का विधिवत् संस्थापक था।
- राजा अन्नमदेव वर्ष एक बारसूर में रहरक दंतेवाड़ा में जा बसा ।
- ‘मन्धोता अन्नमदेव की राजधानी थी तथा कालान्तर में परवर्ती राजाओं ने बस्तर को अपनी राजधानी बनाया।
- अन्नमदेव ने लगभग 45 वर्षों तक शासन किया। अन्नमदेव के बाद बस्तर के राजा अपने आपको चन्द्रवंशी कहने लगे ।
- बस्तर के हलबी – भतरी मिश्रित लोकगीतों में अन्नमदेव को ‘चालकी बंश राजा’ कहा गया है।
पुरूषोत्तमदेव ( 1468-1534 ई.)
- भैरवदेव के पुत्र पुरूषोत्तमदेव ने पच्चीस वर्ष की अवस्था में शासनसूत्र संभाला था।
- पुरुषोत्तमदेव तीर्थयात्रा के लिए जगन्नाथपुरी को रवाना हुए थे।
- पेट के बल सरकते हुए पुरी पहुंचकर उसने जगन्नाथ दर्शन किया और रत्नाभूषण आदि की भेंट चढ़ाई, पुरी के राजा ने पुरूषोत्तम देव का स्वागत किया।
- लौटकर उसने बस्तर में रथयात्रा प्रारम्भ की। बस्तर में यह पर्व गोंचा’ के नाम से प्रसिद्ध है ।
- आज भी यह पर्व जगदलपुर में प्रति क्वार मास में मनाया जाता है । पुरूषोत्तमदेव ने ‘मंधोता को छोड़कर बस्तर में अपनी राजधानी बनायी थी ।
दलपत (1731-1774 ई.)
- दलपतदेव के शासन काल में सम्पूर्ण पार्श्ववर्ती क्षेत्र भोंसलों के आक्रमण से संत्रस्त थे ।
- रतनपुर राजा (छत्तीसगढ़) को अपने अधिकार में लेने के पश्चात 1770 ई. में मराठा सेना ने नीलू पण्डित या नीलू पंत के अधि नायकत्व में बस्तर पर आक्रमण किया था ।
- बस्तर के रणबांकुरो के समक्ष मराठा सेना को घुटने टेकना पड़ा, चालुक्य आदिवासी सेना ने मराठा सेना को काट डाला ।
- अनेक राजाओं ने भोंसलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किन्तु दलपतदेव ने अपने शासन काल में अनेक विपत्तियों के बाद भी भोंसलों की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।
- भोंसला आक्रमण से भयभीत होकर दलपतदेव ने 1770 ई. में बस्तर को छोड़कर जगदलपुर को राजधानी बनाया।
- दलपत देव के शासन काल के समय बंजारो के द्वारा 1770 ई. के आसपास नमक गुड़ विनिमय प्रणाली प्रारंभ हुई।
- नगम गुड़ व्यापार सभ्यता बस्तर हस्तक्षेप और शोषण का प्रमुख आधार बना ।
- वस्तु विनिमय प्रणाली के बारे में जानकारी कैप्टन ब्लंट के लेख से मीलती है।
अजमेर सिंह (1774-1777 ई.) ‘क्रांति का मसीहा’
- दलपतदेव ने युवावस्था में ही पटरानी के पुत्र अजमेरसिंह को डोंगर का अधिकारी बना दिया था ।
- जब दलपतदेव की मृत्यु हुई। उस समय अजमेरसिंह डोंगर में था तथा रानी के पुत्र दरियादेव ने अनाधिकृत रूप से राजा बनने के विचार से अजमेरसिंह पर चढ़ाई कर दी।
- दोनों के मध्य भीषण संघर्ष हुआ तथा दरियादेव पराजित होकर जगदलपुर भाग गया।
- इस प्रकार 1774 ई. में ही अजमेरसिंह बस्तर राजसिंहासन पर बैठा।
- दरियादेव ने जैपुर जाकर वहां के राजा विक्रमदेव (1758 – 1781 ई.) से मित्रता कर ली तथा उसी के माध्यम से नागपुर के भोंसले व कम्पनी सरकार के अधिकारी जॉनसन से सम्पर्क किया ।
- कुछ शर्तों के आधार पर तीनों ही ताकतों ने अजमेरसिंह के विरूद्ध दरियादेव की सहायता करने का वचन दिया।
- 1777 ई. में कम्पनी सरकार के प्रमुख जॉनसन व जैपुर की सेना ने पूर्व से व भोंसला के अधीन नागपुर की सेना ने उत्तर दिशा से जगदलपुर को घेर लिया।
- अजमेरसिंह परास्त होकर जगदलपुर से भाग कर डोंगर चला गया।
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