Kakatiya Vansh GK | छत्तीसगढ़ काकतीय वंश सामान्य ज्ञान

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On: June 20, 2026
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Chhattisgarh kakatiya vansh से CGPSC Vyapam पुलिस exam में प्रश्न पूछे जाते है

  1. काकतीय वंश – प्रारंभिक विवरण बस्तर क्षेत्र में छिंदक नागवंशीय शासक हरिशचन्द्र देव को पराजित कर अन्नमदेव ने काकतीय वंश स्थापित किया ।
  2. बस्तर की जनजाति परम्परा के अनुसार काकतीय वंश को चालकी वंश एवं कुम्हड़ा फलिमा राजवंश नाम से संबोधित किया जाता है।
  3. अन्नमदेव के वारंगल परित्याग के सम्बन्ध में विद्वानों ने विचारधारा प्रस्तुत की है। मुसलमानों के आक्रमण के समय वह वारंगल से खदेड़ दिया गया था।
  4. अन्नमदेव द्वारा बारसूर में काकतीय वंश की स्थापना के पश्चात् इनके वंशजों ने 1936 ई. तक 613 वर्षों तक राज किया।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • शासनकाल 1324-1947 ई.
  • आदिपुरुष – प्रतापरुद्रदेव
  • संस्थापक – अन्नमदेव
  • आरंभिक राजधानी – मंधोता
  • प्रमुख राजधानी – बस्तर, जगदलपुर, बारसूर, राजपुर

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काकतीय वंशीय प्रमुख शासक

  1. अन्नमदेव (1324-69 ई.) अन्नमदेव को दंतेवाड़ा अभिलेख में ‘अन्नमराज कहा गया है, जो प्रतापरूद्रदेव का अनुज थे एवं 1324 ई. में वारंगल छोड़कर बस्तर पहुंचे थे।
  2. इन्होने बस्तर में लघु राज्यों के राजाओं को पराजित किया व समूचे बस्तर का अधिपति बन गया ।
  3. इस प्रकार अन्नमदेव उत्तर-मध्ययुगीन बस्तर के शासन का विधिवत् संस्थापक था।
  4. राजा अन्नमदेव वर्ष एक बारसूर में रहरक दंतेवाड़ा में जा बसा ।
  5. ‘मन्धोता अन्नमदेव की राजधानी थी तथा कालान्तर में परवर्ती राजाओं ने बस्तर को अपनी राजधानी बनाया।
  6. अन्नमदेव ने लगभग 45 वर्षों तक शासन किया। अन्नमदेव के बाद बस्तर के राजा अपने आपको चन्द्रवंशी कहने लगे ।
  7. बस्तर के हलबी – भतरी मिश्रित लोकगीतों में अन्नमदेव को ‘चालकी बंश राजा’ कहा गया है।

पुरूषोत्तमदेव ( 1468-1534 ई.)

  1. भैरवदेव के पुत्र पुरूषोत्तमदेव ने पच्चीस वर्ष की अवस्था में शासनसूत्र संभाला था।
  2. पुरुषोत्तमदेव तीर्थयात्रा के लिए जगन्नाथपुरी को रवाना हुए थे।
  3. पेट के बल सरकते हुए पुरी पहुंचकर उसने जगन्नाथ दर्शन किया और रत्नाभूषण आदि की भेंट चढ़ाई, पुरी के राजा ने पुरूषोत्तम देव का स्वागत किया।
  4. लौटकर उसने बस्तर में रथयात्रा प्रारम्भ की। बस्तर में यह पर्व गोंचा’ के नाम से प्रसिद्ध है ।
  5. आज भी यह पर्व जगदलपुर में प्रति क्वार मास में मनाया जाता है । पुरूषोत्तमदेव ने ‘मंधोता को छोड़कर बस्तर में अपनी राजधानी बनायी थी ।

दलपत (1731-1774 ई.)

  1. दलपतदेव के शासन काल में सम्पूर्ण पार्श्ववर्ती क्षेत्र भोंसलों के आक्रमण से संत्रस्त थे ।
  2. रतनपुर राजा (छत्तीसगढ़) को अपने अधिकार में लेने के पश्चात 1770 ई. में मराठा सेना ने नीलू पण्डित या नीलू पंत के अधि नायकत्व में बस्तर पर आक्रमण किया था ।
  3. बस्तर के रणबांकुरो के समक्ष मराठा सेना को घुटने टेकना पड़ा, चालुक्य आदिवासी सेना ने मराठा सेना को काट डाला ।
  4. अनेक राजाओं ने भोंसलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी, किन्तु दलपतदेव ने अपने शासन काल में अनेक विपत्तियों के बाद भी भोंसलों की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।
  5. भोंसला आक्रमण से भयभीत होकर दलपतदेव ने 1770 ई. में बस्तर को छोड़कर जगदलपुर को राजधानी बनाया।
  6. दलपत देव के शासन काल के समय बंजारो के द्वारा 1770 ई. के आसपास नमक गुड़ विनिमय प्रणाली प्रारंभ हुई।
  7. नगम गुड़ व्यापार सभ्यता बस्तर हस्तक्षेप और शोषण का प्रमुख आधार बना ।
  8. वस्तु विनिमय प्रणाली के बारे में जानकारी कैप्टन ब्लंट के लेख से मीलती है।

अजमेर सिंह (1774-1777 ई.) ‘क्रांति का मसीहा’

  1. दलपतदेव ने युवावस्था में ही पटरानी के पुत्र अजमेरसिंह को डोंगर का अधिकारी बना दिया था ।
  2. जब दलपतदेव की मृत्यु हुई। उस समय अजमेरसिंह डोंगर में था तथा रानी के पुत्र दरियादेव ने अनाधिकृत रूप से राजा बनने के विचार से अजमेरसिंह पर चढ़ाई कर दी।
  3. दोनों के मध्य भीषण संघर्ष हुआ तथा दरियादेव पराजित होकर जगदलपुर भाग गया।
  4. इस प्रकार 1774 ई. में ही अजमेरसिंह बस्तर राजसिंहासन पर बैठा।
  5. दरियादेव ने जैपुर जाकर वहां के राजा विक्रमदेव (1758 – 1781 ई.) से मित्रता कर ली तथा उसी के माध्यम से नागपुर के भोंसले व कम्पनी सरकार के अधिकारी जॉनसन से सम्पर्क किया ।
  6. कुछ शर्तों के आधार पर तीनों ही ताकतों ने अजमेरसिंह के विरूद्ध दरियादेव की सहायता करने का वचन दिया।
  7. 1777 ई. में कम्पनी सरकार के प्रमुख जॉनसन व जैपुर की सेना ने पूर्व से व भोंसला के अधीन नागपुर की सेना ने उत्तर दिशा से जगदलपुर को घेर लिया।
  8. अजमेरसिंह परास्त होकर जगदलपुर से भाग कर डोंगर चला गया।

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