cg festival gk in hindi छत्तीसगढ़ जनजातीय पर्व एवं त्यौहार यह बहुत ही महत्वपूर्ण टॉपिक ही इससे एग्जाम में 1 प्रश्न आता ही है CGPSC VYAPAM POLICE जैसे एक्सामो में
CG Ke Pramukh Tyohar GK
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छत्तीसगढ़ में लगभग एक तिहाई जनसंख्या जनजातियों की हैं। आज भी ये अपनी संस्कृति को विभिन्न पर्वों के माध्यम से जीवन्त बनाए हुए हैं। संस्कृति को प्रवाहमान बनाने में लोक पर्वो का महत्वपूर्ण स्थान है। इनके कुछ प्रमुख पर्व इस प्रकार है-
1) बीज पुटनी / माटी तिहार:- चैत मास को (बस्तर में )
- मिट्टी की वास्तविक स्वरूप की पूजा की जाती हैं ।
- देवगूड़ी परिसर में छोटा गड्ढा खोदकर कुएँ के समान आकृति बनाकर बीज धान को अपने आराध्य देवता को समर्पित किया जाता है एवं प्रसाद स्वरूप बीज धान वितरित किया जाता है ।
2) ककसार पर्व :-
- माटी तिहार के पश्चात् मनाया जाता हैं ।
- बरसात एवं गर्मी के मध्य मनाया जाता है ।
- अबुझमाड़िया जनजाति का मुख्य पर्व है ।
- दोरला – दंडामी माड़िया जनजाति शामिल होता हैं ।
- अच्छे फसल के लिए भोज देव की पूजा करते हैं ।
- गोत्रीय देव पूजन पर्व हैं ।
3) गोबर बोहरानी पर्व :- चैत मास को ।
- छिंदगढ़ (सुकमा) विकासखंड के कुछ गाँवों में 10 दिनों तक चलता हैं ।
- ग्राम देवी की स्थापना उसके पश्चात् शस्त्र पूजा करते हैं ।
- शिकार के लिए जाते हैं। खाकर रात में इकट्ठा होते हैं तथा नृत्य संगीत गीत के माध्यम से मनोरंजन करते है ।
- गढ्ढे में गोबर इकट्ठा करते हैं । आखिरी दिन एक-दूसरे के ऊपर गोबर छिड़कते है तथा कुछ गोबर अपने खेतों में डालते हैं ।
4) सरहुल पर्व :- चैत मास (लगभग अप्रैल माह) को उराँव जनजाति द्वारा ।
- धरती माता का प्रतिकात्मक विवाह रचाया जाता हैं ।
- मुर्गा (सूर्य) एवं काली मुर्गी (धरती माता) विवाह विधि विधान से प्रकृति प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण हैं ।
5) भीमा जतरा दोरला
- यह त्यौहार ज्येष्ठ माह में दोरला जनजाति के द्वारा मनाया जाता है।
- इस अवसर पर तीन साल में एक बार भीमादेव का धरती माता से विवाह रचाया जाता है
- बस्तर के अन्य क्षेत्रों में वर्षा की कामना हेतु “कप्पल पेण्डुम” त्यौहार मनाया जाता है।
- कप्पल पेण्डुम त्यौहार केवल स्त्रियां मनाती हैं, जिसमें ये “मेंढकों का विवाह” रचाती हैं इसे “मेंढका विवाह” भी कहते है ।
6) गोंचा पर्व आषाढ़ मास
- काकतीय नरेश पुरूषोत्तम देव के रथयात्रा से प्रेरित हैं ।
- ग्रामवासी जगन्नाथ जी की मूर्ति को रथ में नौ दिनों तक घूमाते हैं तथा दसवें दिन तुपकिया चलाते हैं
- 10 वें दिन जगन्नाथ मंदिर में भगवान को पुनः स्थापित किया जाता है ।
7) अमूंस तिहार: सावन अमावस्या / हरेली अमावस्या को
- पशु-औषधि की पूजा । रसना एवं शतावरी पौधों का विशेष महत्व होता है ।
- इन दोनों पौधों का पशु चिकित्सा में विशेष महत्त्व होता है । है।
8) करमा पर्व : भादो मास
- उराँव जनजाति का मुख्य पर्व है तथा इसमें बैगा, गोंड, बिंझवार आदि जनजातियों द्वारा भी इसे मनाया जाता है ।
- ध्येय:- जीवन में कर्म की असीम प्रधानता का महत्व एवं श्रम साधना का महत्व समझाना |
- बुआई व फसल कटाई के अवकाश काल में मनाया जाता है।
- यह कृषि संबंधी (कृषक) पर्व है ।
- अच्छे फसल की कामना के लिए यह पर्व मनाया जाता है।
- नृत्य – करमा । (नोट:- करमा नृत्य में भाग लेने वाले पुरुष सदस्य के पगड़ी में सिंग नहीं होता है)
9) नवाखानी पर्व : भादो प्रथमा से पूर्णिमा तक ।
- नये फसल कुल देवी- देवताओं को समर्पित किया जाता हैं ।
- इस पर्व के पश्चात् आदिवासी नई फसल को उपभोग में लाते हैं ।
- नोट:- नवाखायी उत्सव में धान की कटाई की घोषणा की जाती है ।
10) बासी तिहार :- फागुन मास में (वर्ष के अंत में)
- नववर्ष का इंतजार करते हुए नाच-गाना के साथ मनोरंजन करते हैं ।
11) चरू जातरा पर्व :- कृषि भूमि की पूजा की जाती हैं।
- पुरुष प्रधान पर्व है ।
- बकरा, हंसा, मुर्गा, कबूतर की बलि देने की प्रथा प्रचलित हैं ।
12. दियारी पर्व- बस्तर क्षेत्र में निवास करने वाली लगभग सभी जनजातियों द्वारा
- बस्तर अंचल में दीपावली के अवसर पर जनजातियों द्वारा यह पर्व मनाया जाता है,
- अतः इसे जनजातियों का दीवाली कहा जाता है। इस अवसर पर गोठान की पूजा की जाती है।
13) बाली बरब पर्व :- हल्बा एवं भतरा भीमादेव को समर्पित ।
- सेमल का विशेष स्तंभ स्थापित किया जाता हैं ।
14) आमाखायी पर्व :- आम के फलने के समय। (बस्तर में) · धुरवा / परजा जनजाति द्वारा ।
15) लक्ष्मी जगार पर्व :– धान की बाली को खेत से लाते हैं जगार घर में लक्ष्मी ( धान की बाली) एवं विष्णु (जगार घर में स्थापित नारियल) का विवाह किया जाता हैं।
16. मेघनाथ पर्व- गोंड़ · फाल्गुन माह में गोंड जनजाति द्वारा यह पर्व मनाया जाता है। · मेघनाथ के प्रतीक के रूप में मेघनाथ खम्भ लगाकर उसके चारों ओर घूमकर पूजा की जाती है।
17. लारू काज पर्व – गोंड़ · लारुकाज गोंड़ों का त्योहार है जो सुअर की बलि से जुड़ा है। · लारु = दूल्हा, काज = अनुष्ठान इसका अर्थ है विवाह उत्सव । · यह त्यौहार सुअरों के विवाह का सूचक है। यह त्यौहार 9-12 वर्ष के अंतराल में गोंड़ जनजातियों द्वारा नारायणदेव के सम्मान में मनाया जाता है।
18. नवान्न पर्व गोंड़ जनजाति
- नई फसल के पकने पर दीपावली के बाद यह पर्व मनाया जाता है।
- गोंड़ सबसे पहले साजा के पेड़ को हरे धान का प्रसाद चढ़ाते हैं,
- फिर भवानी माता, होलेरा देव (पशु देवता),
- नारायण देव और रात माई (रात की मां) को चढ़ाते हैं,
- जिनके बारे में माना जाता है, कि वे हर घर के बरामदे में रहती हैं।
- किन्ही – किन्ही स्थानों पर इस पर्व को ‘छोटी दीपावली’ भी कहा जाता है।
19.गारा गौरा पर्व गोंड़
- कार्तिक माह में दीपावली के अवसर पर गोंड़ समुदाय द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता है।
- इस दिन ‘कुंवारी’ स्त्रियां मिट्टी को लाकर शाम तक गौरी-गौरा की प्रतिमा का निर्माण कर उन्हें पृथक-पृथक स्थानों पर रखती है।
- रात्रि में शिव-पार्वती का पूजन कर उनका विवाह कराया जाता है,
- सुबह होते ही ग्राम भ्रमण कर इन प्रतिमाओं को विसर्जित कर दिया जाता है।
- इस दिन गोंड़ आदिवासी भीमसेन की प्रतिमा भी तैयार करते हैं।
- रतौना पर्व बैगा जनजाति · इस पर्व का संबंध नागा बैगा से है।
20. रसनवा पर्व– बैगा जनजाति · रस- नवा बैगाओं का विशेष पर्व है।
- रस- नवा का अर्थ है शहद का औपचारिक भोजन ।
- यह त्योहार हर नौ साल में एक बार आता है।
- बैगा लोग इस त्योहार को अपने महान पूर्वज नागा बैगा से जोड़ते हैं।
- कोरा पर्व कोरवा यह त्यौहार क्वार माह में कोदो कुटकी की कटाई के बाद मनाया जाता है।
21. धेरसा पर्व कोरवा -कोरवा जनजाति के द्वारा पौष माघ के माह में सरसों की फसल कांटने के पश्चात् यह त्यौहार मनाया जाता है।
22. बीजबोहनी पर्व कोरवा –
- कोरवा जनजाति द्वारा खेतों में बीज बोने से पूर्व यह त्यौहार मनाया जाता है।
23. चैत्रई पर्व – परजा
- इस त्यौहार में सुअर एवं मुर्गे की बलि दी जाती है।
24. धनकुल या जगार पर्व हल्बा, भतरा जगार अर्थात् सांस्कृतिक जागरण ।
हल्बा जनजातियों के द्वारा मुख्य रूप से चार प्रकार के जगार पर्व मनाए जाते हैं-
- (1) तीजा जगार (तीजा त्यौहार के अवसर पर)
- (2) आठे जगार (कृष्णजन्माष्टमी पर )
- (3) लक्ष्मी जगार (लक्ष्मी पूजा के अवसर पर)
- (4) बाली जगार ( धान की बालियाँ आने पर) इस पर्व में धनकुल वाद्य यंत्र बजाकर गुरुमाएँ गायन करती हैं तथा कथा सुनाती हैं।
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