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जनजातीय लोकनाट्य छत्तीसगढ़ की जनजातियों द्वारा विभिन्न प्रकार के लोकनाट्य का आयोजन किया जाता है-
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भतरानाट लोकनाट्य
- आयोजन :- सामान्यतः ग्रीष्म ऋतु में (मेला, मड़ई, उत्सव या जात्रा पर्वों में)
- मंचन :- खुले मैदान (मंच तम्बू, लकड़ी) नाटकुरिया
- भतरानाट के कलाकार 20-40 कलाकारों की मंडली को
- सूत्राधार:- नाट की शुरुआत
- भतरानाट को ‘उड़ीयानाट’ भी कहते है
- भाषा भतरी भाषा में मंचन किया जाता है।
- बस्तर में उड़ीसा प्रांत की सीमा से लगे हुए भाग में निवास करने वाले भतरा जनजाति के लोगों द्वारा भतरानाट किया जाता है। भतरानाट नृत्य प्रधान होता है तथा यह बस्तर में उड़ीसा से आया है इसलिए इसे कुछ लोग उड़िया नाट भी कहते हैं। इस नाट्य की बोली भतरी है।
- इसका मंचन गर्मी के दिनों में उत्सव, जात्रापर्व या मड़ई के अवसर पर खुले मैदान में छोटे से मंच पर किया जाता है। इसमें 30-40 सदस्य होते हैं, किन्तु इसमें केवल पुरुष भाग लेते हैं, ज्यादातर पुरुष पात्र ही महिला पालों की भूमिका निभाते हैं। भतरानाट के सदस्य को “नाटकुरया” कहा जाता है।
- अधिकांश भतरानाट युद्ध प्रधान होते हैं। यह महाभारत, रामायण एवं पौराणिक आख्यानों के कथानकों पर केन्द्रित रहता है। जैसे- रावणवध, कंशवध, कीचक वध, हिरण्य कश्यप वध, जरासंघ, लंकादहन, रुक्खमणी हरण आदि लोकप्रिय है। इसके अतिरिक्त इंदिरा गांधी की हत्या पर आधारित भतरानाट किया जा चुका है।
- यह बस्तर की पूर्ण विकसित नाट्य विधा है इसलिए इसे “बस्तर का आदिवासी थियेटर” भी कहते हैं।
माओपाटा
- मुड़िया का शिकार प्रधान ( शिकार नृत्य) जनजाति नाट्य है ।
- गौर पशु / जंगली भैंस / सांभर / संभर पशु के शिकार पर आधारित लोकनृत्य / लोकनाट्य है ।
- माओ (गोंडी भाषा) = गौर / बायसन
- पाटा (गोंडी भाषा) = नृत्य
- वाद्ययंत्र :- टिमकी एवं कोटाईका / कोटोड़का
- सज्जा के तत्व – चेहरे में काजल, मिटटी एवं राख का प्रयोग किया जाता है ।
- एक गाँव में पशु (बायसन / सांभर ) को शिकारियों द्वारा चारों और से घेर लेते है, एक शिकारी बेहोश हो जाता है, ‘सिरहा’ द्वारा मंत्रोच्चारण करके उठाया जाता है, बेहोश शिकारी को होश आता है एवं तत्पश्चात पशु का शिकार कर लिया जाता है। फिर ख़ुशी से सभी शिकारी झुमने लगते है । इसके पश्चात् यह नृत्य एवं शिकार प्रधान लोकनाट्य पूर्ण होता है ।
- बस्तर की वास्तविक जीवन शैली की धड़कन ” कहा जा सकता है।
खम्भस्वांग
- कोरकू जनजाति का लोकनाट्य है ।
- खम्भस्वांग का अर्थ – “खम्भे के आस-पास किया जाने प्रसहन”
- अवसर – कुंवार नवरात्रि से कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी (जेठऊनी) तक दीपावली के पश्चात् प्रारंभ होता है
- ( छ.ग. समग्र) जनश्रुति के अनुसार – लंकापति रावण के पुत्र मेघनाथ ने कोरकुओं को एक बार बड़ी विपत्ति से बचाया था, इसलिए कोरकू जनजाति में घनाथ को अपना संरक्षक मानते है ।
- मेंघनाथ की स्मृति में इसलिए “मेघनाथ स्तंभ” को स्थापित करके प्रत्येक रात्रि आस पास स्वांग करते है एवं खेल खेलते है ।
- यह लोकनाट्य – गीत, संगीत, नृत्य एवं अभिनय की दृष्टि से ‘सम्पूर्ण विधा’
दहिकांदो
- अवसर – समान्यतः कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर,
- क्षेत्र मैदानी क्षेत्र में रहने वाले जनजातियों द्वारा प्रतिमा स्थापना कदंब के वृक्ष के नीचे राधा-कृष्ण की मूर्ति स्थापित किया जाता है
- मूर्ति के चारों ओर नृत्य एवं अभिनय किया जाता है
- कथानक – श्रीकृष्ण जी के लीलाओं का मंचन किया जाता है,
- करमा नृत्य एवं रहस का अद्भुत समन्वय है, जो उत्साह एवं धार्मिक मर्म से ओत-प्रोत होता है ।