CG Nritya GK Questions All Competitive Exam Helpful in Hindi
छत्तीसगढ़ राउत नाचा
राउत नाचा परिचय राउत जाति के लोग स्वयं को श्रीकृष्ण का वंशज मानते हैं।
- पौराणिक कथा के अनुसार श्री कृष्ण ने जब मामा कंस का वध किया था, तब से यह नृत्य “विजय प्रतीक” स्वरूप प्रारंभ किया गया था। अतः यह नृत्य शौर्य या शौर्य कलात्मक नृत्य कहलाता है। मुख्य रूप से दीपावली के अवसर पर (दीवाली से जेठउनी तक ।
- यदुवंशी इसे भगवान श्रीकृष्ण के पूजा के प्रतीक में यह नृत्य करते हैं ।
- दोहा का गायन तथा गड़वा बाजा बजाया जाता है ।
- गोवर्धन पूजा एवं मातर के दौरान किया जाता है ।
- भगवान श्री कृष्ण के लीलाओं का प्रतीकात्मक मंचन किया जाता है ।
- बिलासपुर का राऊत नृत्य प्रतियोगिता प्रसिद्ध ।
- शुरूआत 1978 से लालबहादुर शास्त्री मैदान, बिलासपुर पर ।
आयोजन
- यह पारंपरिक लोक नृत्य दीपावली और उसके आसपास धान की कटाई के साथ और विशेष रूप से कार्तिक प्रबोधिनी एकादशी पर किया जाता है,
- राउत जाति के लोगों द्वारा किया जाता है।
- नर्तक अपने स्वामियों के घरों में जाते हैं, गायों को “सुहाई” बांधते हैं,
- दोहा गाते और इस नृत्य को करते हैं और अपने स्वामियों की सुख और समृद्धि की कामना करते हैं।
वेशभूषा और नृत्य
- इस नृत्य रूप में, राउत जाति के पुरुष भारी श्रृंगार और पोशाक का उपयोग करते हैं,
- अपने सिर के चारों ओर पगड़ी लपेटते हैं और किनारे पर एक मोर पंख लगाते हैं,
- वे धड़ के ऊपर एक जैकेट पहनते हैं जिसे “सालुखा” कहा जाता है और साथ में धोती पहनते है।
- वे छाती पर कौरियों के साथ जड़ा हुआ एक जैकेट भी पहनते हैं और हाथ मे लाठी रखते हैं।
- वे दोहा गाते हैं और नृत्य करते हैं।
- इस नृत्य में केवल पुरुष (बालक, किशोर, युवा, प्रौढ़) भाग लेते हैं तथा लड़की का पात्र भी पुरुष कलाकार निभाते हैं।
- नृत्य के बीच-बीच में दोहे गाये जाते हैं। उसी दोहे की पुनरावृत्ति करते हुए “गड़वा बाजा” की धुन पर सभी नृत्य करते हैं।
- टिमकी, मोहरी, सिंगबाजा, ढोलक, डफड़ा आदि विभिन्न वाद्यों का प्रयोग कर यह नृत्य किया जाता है।
- यह दोहे भक्ति, नीति, हास्य तथा पौराणिक संदर्भों से युक्त होते हैं।
- राउत नाचा को “गहिरानाच ” के नाम से भी जाना जाता है।
पंथी नृत्य
- पंथी नृत्य छत्तीसगढ़ के सतनामी जाति के द्वारा किया जाने वाला लोकनृत्य है।
- चूंकि यह नृत्य शैली एक विशेष पंथ / समुदाय से संबंधित है इसलिए इसे “पंथी नृत्य” नाम दिया गया है।
- सतनाम पंथियो के द्वारा नृत्य का मंचन किया जाता है । (पुरूष का नृत्य)
- गुरू घासीदास जी के जीवनलीला का गुनगान किया जाता हैं ।
- सर्वप्रथम जैतखाम स्थापित किया जाता है तत्पश्चात् नृत्य करते हैं ।
- नृत्य के अंत में पिरामिड जैसी आकृति का निर्माण होता है ।
- वाद्ययंत्र:- झांझ, मंजीरा, मांदर ।
- अंतर्राष्ट्रीय कलाकार स्वर्गीय देवदास बंजारे एवं राधेश्याम बारले (पद्मश्री 2021)
आयोजन
- यह नृत्य सामान्यतः गुरू घासीदास जयंती (18 दिसम्बर) तथा विशेष अवसरों पर गुरूघासीदास जी की स्तुति में किया जाता है,
- जिसमें गुरु घासीदास जी के उपदेशों, जीवन चरित्र, उनके प्रति अपनी भावनाओं को विशेष नृत्य एवं गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
वेशभूषा और नृत्य
- पंथी नर्तकों की वेशभूषा सहज और उज्ज्वल होती है,
- नृत्य रूप बहुत ही आकर्षक और मनोरंजक होने के साथ-साथ आध्यात्मिक और भक्तिपूर्ण भी होता है।
- पंथी नृत्य की शुरूआत गुरु वन्दना से होती है,
- इस नृत्य में नर्तक जैतखाम की स्थापना कर उस पर श्वेत ध्वज (पालो) फहराते हैं तथा उसके आस- पास गोल घेरा बनाकर गीत गाकर नृत्य करते हैं।
- “मांदर” की थाप, “झाँझ” की झनकार तथा बाबा की जयकारा से यह नृत्य प्रारंभ होता है। प्रारंभ में गीत एवं नृत्य की गति धीमी होती है।
- किन्तु जैसे-जैसे गीत आगे बढ़ता है ‘तथा मृदंग की लय तेज होती जाती है, वैसे-वैसे पंथी नर्तकों की आंगिक चेष्टाएँ तेज होती जाती है तथा नृत्य मुद्राएँ तेजी से बदलती जाती है।
- इस दौरान मुख्य नर्तक पहले गीत की कड़ी उठाता है, · अन्य नर्तक उसे दोहराते हुए तेजी से नाचते हैं।
- इस नृत्य में नर्तक कलाबाजी करते हैं तथा पिरामिड बनाते हैं,
- महिलाएँ सिर पर कलश रखकर नृत्य करती हैं।
- संबंधित व्यक्तित्व – स्वर्गीय देवदास बंजारे तथा उनके साथियों ने अपनी साधना, लगन एवं परिश्रम से पंथी को राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया है।
सुआ नृत्य परिचय
- छत्तीसगढ़ अंचल में सुआ नृत्य महिलाओं एवं किशोरियां (स्त्री प्रधान) द्वारा किया जाता है।
- उत्तर एवं मध्य छत्तीसगढ़ में धान के पकने पर धान कटाई के बाद इस गीत को बड़े उत्साह के साथ गाया जाता है।
आयोजन
- सुआ नृत्य दीपावली से कुछ दिन पहले शुरू होता है और लक्ष्मीपूजन तक किया जाता है।
- राज्य में युवतियों तथा महिलाओं द्वारा किया जाता हैं ।
- बाँस की टोकरी में मिट्टी निर्मित दो सुआ / तोता (शिव एवं गौरी) का प्रतीक स्वरूप रखती हैं ।
- टोकरी के गोल घूमकर ताली के थाप में नृत्य करती हैं ।
- प्रेमगीत (गीत: तरी हरी ना ना…….. ..) मुकुटधर पाण्डेय द्वारा इसे “छत्तीसगढ़ का गरबा ” की संज्ञा दी जाती है।
वेशभूषा और नृत्य
- सुआ अर्थात् तोता। इस अवसर पर महिलाएँ गोलाकार घेरा बनाकर घेरे के बीच धान से भरी टोकनी में मिट्टी के बने दो तोते (सुआ) रखकर उसके चारो ओर घूम-घूम कर, ताली बजाकर गीत गाते हुए नृत्य करती हैं।
- ये 02 तोते या सुआ भगवान शिव एवं पार्वती के प्रतीक होते हैं।
- इस गीत में स्त्रियाँ तोते के माध्यम से अपने प्रेमी को संदेश भेजती हैं तथा तोते को अपने मन की बात बताती हैं, ताकि वह उनकी व्यथा को उनके प्रेमी तक पहुंचा दे।
- इस नृत्य में किसी भी प्रकार के वाद्य यंत्र (कुछ अपवादो को छोड़कर) का प्रयोग नहीं किया जाता है।
चंदैनी
- लोक कथाओं पर आधारित लोकनृत्य हैं
- “लोरिक चंदा” के नाम से सुप्रसिद्ध
- यह एक प्रेम गाथा है। पुरूष प्रधान नृत्य है।
- लोरिक (रीवा निवासी) एवं चंदा (आरंग निवासी) के प्रेम गाथाओं पर आधारित है।
- श्रृंगार रस (प्रेम रस) पर आधारित ।
- वाद्य यंत्र:- ढोलक एवं टिमकी ।
- दो शैली:- 1) लोक कथा तथा 2) नृत्य गीत शैली ·
- रामचन्द्र देशमुख :- “छ.ग. लोक कला मंच के उद्धारक” ·
- सुरुजबाई खाण्डे:- सुप्रसिद्ध चंदैनी एवं भरथरी गायिका ।
- रवान यादव:- चंदैनी में पार्श्व संगीत दिया।








