Chhattisgarh lok parv tyohar से CGPSC Vyapam पुलिस exam में प्रश्न पूछे जाते है
chhattisgarh ke lok parv tyohar छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाले त्योहार
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1) अक्ती:- वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया को
- लड़कियों के द्वारा गुड्डा-गुड़िया विवाह संपन्न करवाया जाता हैं।
- पौराणिक मान्यताः धृतराष्ट्र एवं गंधारी का विवाह संपन्न हुआ।
- परशुराम जयंती।
2) हरेली:- सावन अमावस्या को
- छत्तीसगढ़ का सर्वप्रथम पर्व एवं किसानों का लोक पर्व हैं।
- अच्छे फसल तथा हरियाली की कामना से मनाया जाता हैं।
- कृषि उपकरणों की पूजा की जाती हैं। सवनाही चित्रकारी होता है मीठा चीला ( प्रसाद स्वरूप) बनाय जाता हैं।
3) भोजली:- भोजली रोपन सावन शुक्ल पक्ष नवमीं को
- भोजली विषर्जन भादो कृष्ण पक्ष प्रथमा ।
- विसर्जन के समस भोजली गीत गाया जाता हैं, जिसमें गंगा मैय्या क बार-बार उच्चारण होता हैं। “देवी गंगा, देवी गंगा, लहरा तुरंगा.., तुम्हरे नहर म भोजली के भीजे आठो अंगा….” आगामी वर्ष का भूजल और फसल के पूर्वानुमान के लिए भोजली क रोपण किया जाता है।
- गेहूँ और उड़द आदि बीजो का रोपण किया जाता है।
4) बहुरा चौथ :- भादो कृष्ण चतुर्थी को
- इस दिन निसंतान माताएं संतान प्राप्ति के लिए गाय, शेर, श्रीकृष्ण एवं गणेश जी की पूजा करते हैं ।
- चन्द्रमा के उदय तक माताओं द्वारा यह व्रत रखा जाता है ।
5) कमरछठ (हलषष्ठी):- भादो कृष्णपक्ष षष्ठी को
- माताएँ बच्चों की लंबी आयु के लिए उपवास रखती हैं।
- शिव-पार्वती (गौरा-गौरी) की पूजा की जाती हैं।
- पसहर चावल तथा 6 प्रकार के भाजी को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता हैं।
- प्रसाद:- लाई, महुआ, चना ।
6) आठे कन्हैय्या (कृष्णजनमाष्टमी ) :- भादो कृष्ण पक्ष अष्टमी।
- आठवें पुत्र होने के कारण आठ कठपुतलियों का पूजा की जाती है।
- चित्रकारी आठे कन्हैया
7) पोला:- भादो अमावस्या को
- किसानो का पर्व हैं ।
- किसान पशुधन की पूजा करते हैं ।
- बैलों को विशेष रूप से सजाया जाता है एवं बैल प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। प्रतीक स्वरूप मिट्टी के बैल की पूजा की जाती हैं।
- व्यंजन खुरमी ।
8) तीजा:- भादो शुक्ल पक्ष तृतीया को
- महिलाएँ पति के लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास करती हैं।
- चित्रकारी हरतालिका ।
- व्यंजन ठेठरी ।
9. गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष के प्रथमा को ·
- राऊत जाति का पर्व हैं।
- गोबर से श्रीकृष्ण जी की विशेष आकृति बनाकर पशुधन के खुर से खुदवाते हैं ।
- राऊत नाचा का आयोजन किया जाता है एवं ठाकुरों को आशीष दिया जाता हैं ।
10) मातर
- कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को राऊत जाति का परंपरागत पर्व ।
- खोड़हर देव की पूजा करते हैं।
11) जेठऊनी
- कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को माता तुलसी का विवाह सालिकराम से सम्पन्न कराया जाता है।
- गन्ने से मड़वा का निर्माण किया जाता है।
12) छेरछेरा:- पूस पूर्णिमा को
- नये फसल /धान/ अनाज के कटाई के बाद बच्चे घर-घर जाकर अनाज माँगते हैं।
- अन्न मांगते समय युवक नर्तक को नकटा एवं युवतियों को नकटी कहा जाता है ।
- छेरछेरा गीत “छेरछेरा माई कोठी के धान ला हेर हेरा” भी गाया जाता है।
13) मेघनाथ पर्व – बासीतिहार
- सर्वप्रथम हिन्दू कैलेण्डर ईसा पूर्व में विकसित खगोलीय दर्शन के द्वारा चन्द्र मास के आधार पर बनाया गया था। हिन्दू कैलेण्डर में अंग्रेजी कैलेण्डर की तरह 12 माह होते हैं जिसमें 15-15 दिन के दो पखवाड़े होते हैं।
- पूर्ण चंद्रमा अर्थात् पूर्णिमा के बाद अगला दिन माह का पहला दिन होता है, इस समय चाँद ढलता जाता हैं जिसे कृष्ण पक्ष (15 दिन) कहते है और 15वें दिन अमावस्या आता है।
- अमावस्या के बाद चाँद प्रकाशमय होने लगता है और इस 15 दिन की कालावधि को शुक्ल पक्ष कहते हैं, 15वें दिन पूर्णिमा होता है।
- इस प्रकार 30 दिन का एक माह पूर्ण होता है। हिन्दू कैलेण्डर का प्रथम मास चैत्र तथा अंतिम मास फाल्गुन होता है। इस वैदिक मासों के नाम को राशियों के आधार पर रखा गया है। सभी माह का अपना एक धार्मिक महत्व है तथा अपने त्यौहार एवं पर्व है जो इस प्रकार है-
जंवारा पर्व
- तिथि – वर्ष में दो बार चैत्र एवं क्वार मास में नवरात्रि का आयोजन किया जाता है, जिसमे चैत्र नवरात्रि में जँवारा पर्व मनाया जाता है।
- जवांरा – नवरात्रि के प्रथम दिन माता के मंदिर में ज्योति स्थापित करने के साथ-साथ जंवारा बोया जाता है।
- बांस की बनी टोकनी में मिट्टी व खाद डालकर उसमें गेहूँ, जौ, अरहर तथा मूंग जैसे अनाजों को बोया जाता है। ·
- 5-6 दिन के बाद ये बीज पौधे के रूप में विकसित हो जाते हैं, इसे ही जंवारा कहा जाता है।
- कामना – जँवारा पर्व अच्छे फसल की कामना हेतु मनाया जाता है
- संकेत – जँवारा का स्वरूप उस वर्ष के मौसम व फसल की अच्छी-बुरी पैदावार का संकेत देता है।
- यज्ञ – नवरात्र पर्व के अंतिम दिन अर्थात नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना यज्ञ-अनुष्ठान सहित की जाती है।
- जवारा विसर्जन इसी दिन महिलाएं जंवारा को सिर में रखकर आकर्षक झांकी के साथ सामूहिक रूप से स्थानीय नदी एवं तालाबों में विसर्जित कर देती हैं ।
- जवारा विसर्जन के दौरान जँवारा गीत गाती हैं। |
अक्षय तृतीया / अक्ती / पुतरा-पुतरी पर्व
- तिथि – अक्षय तृतीया का पर्व बैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है।
- पूजा इस दिन भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।
- मान्यता – पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन किया गया शुभ कार्य अक्षय फल देता है। इस दिन से विवाह कार्य भी प्रारंभ हो जाते है।
- मान्यता है कि इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे-विवाह, गृह प्रवेश, नए वस्त्र एवं आभूषणों की खरीददारी आदि किए जा सकते हैं। कहते हैं कि इस दिन प्रारम्भ किए गए कार्य तथा दिए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता है।
- विशेष छत्तीसगढ़ के साथ ही अनेक अंचलों पर इस दिन बच्चे पालक बनकर पूरे रीति-रिवाज के साथ अपने गुड्डे-गुड़ियों का विवाह रचाते हैं।
- इस दिन परशुराम जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।
हरेली
- तिथि – श्रावण अमावस्या को हरेली का पर्व अत्यधिक उल्लास के साथ मनाया जाता है।
- प्रथम पर्व – छत्तीसगढ़ अंचल मे यह प्रथम पर्व एवं मूलतः किसानों का पर्व है।
- हरेली भीषण गर्मी के बाद वर्षा होने से हरियाई हुई धरती के प्रति कृतज्ञता · प्रकट करने हेतु हरेली पर्व मनाया जाता है।
- पूजा धान की बुआई तथा रोपाई के बाद इस दिन कृषक अपने कृषि एवं लौह उपकरणों की पूजा करते हैं। इस दिन लोग अपने कुलदेवता एवं ग्रामदेवता की भी पूजा करते हैं।
- कामना अच्छी फसल की कामना करते हैं।
- व्यंजन- इस अवसर पर घरों में गुड़ का चीला (गुरहा चीला) तथा पकवान · बनाया जाता है।
- सामाजिक महत्व – इस दिन गांव में यादव समाज के लोग घर के मुख्य दरवाजे तथा वाहनों पर नीम की डालियाँ बांधते हैं ताकि परिवार के लोगों की वर्षा जनित रोगों से सुरक्षा की जा सके।
- मनोरंजन इस दिन बच्चे लकड़ी या बांस की गेड़ी चढ़ते हैं।
- इस दिन गाँव व शहरों में सुबह पूजा-अ -अर्चना के बाद नारियल फेंक प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है।
- सवनाही चित्रकारी ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार इस दिन आसूरी शक्तियाँ तंत्र-साधना या जादू-टोना सिद्ध करती है। इसलिए इस दिन घर के बाहर गोबर से प्रेत बनाया जाता है।
- बैगा पूरे गांव को इन बुरी शक्तियों से बचाने के लिए तंत्र-मंत्र से बांध देता है।
भोजली पर्व
- तिथि – भोजली पर्व भादो कृष्ण पक्ष प्रतिपदा अर्थात रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है।
- शाब्दिक अर्थ भो-जली अर्थात् भूमि में जल हो ।
- भोजली – महिलाएँ सावन शुक्ल पंचमी या नवर्मी के दिन मिट्टी के बर्तन मे या टोकनी में खाद, मिट्टी, राख डालकर उसमे धान, गेहूँ, आदि के थोड़े दाने बो देती हैं तथा सावन पूर्णिमा तक उसमें चार-छः इंच तक के पौधे निकल आते हैं, इसे ही भोजली कहा जाता है।
- कामना – श्रावण मास में बीज बोने के बाद प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने तथा अच्छी फसल की कामना हेतु यह पर्व मनाया जाता है।
- प्रतीक भोजली नई फसल का प्रतीक होती है। TM ·
- भोजली सेवा – महिलाएँ अच्छी वर्षा एवं भरपूर भंडार देने वाली फसल की कामना करते हुए फसल के प्रतीकात्मक रूप भोजली का आयोजन करती हैं।
- विसर्जन रक्षाबंधन के दूसरे दिन कुंवारी कन्याएँ स्थानीय नदी एवं तालाब में सामूहिक रूप से भोजली विसर्जित करती हैं। भोजली विसर्जित करते समय गंगा देवी को सम्बोधित करते हुए भोजली गीत गाया जाता है जिसमें बार-बार गंगा का नाम आता है- “देवी गंगा, देवी गंगा लहरा तुरंगा तुम्हरे नहर में भोजली के, भीजे आठो अंगा।
- ” भोजली बदना – भोजली पर्व ” मिलता ” का भी प्रतीक है।
- इस दिन मित्र एक-दूसरे के कान में भोजली के कुछ पौधे लगाकर जीवन भर साथ निभाने का वचन देते हैं। |
बहुराचौथ
- तिथि – भादो कृष्ण चतुर्थी को बहुराचौथ का पर्व मनाया जाता है। यह वर्ष की प्रमुख चार चतुर्थियों मे से एक है।
- कामना एवं व्रत – इस दिन माताएँ अपने पुत्र की रक्षा हेतु एवं संतानहीन
- महिलाएं संतान प्राप्ति के लिए चन्द्रमा के उदय होने तक श्री गणेश के निमित्त व्रत रखती हैं।
- पूजा इस दिन शेर, गाय श्री कृष्ण एवं गणेश जी की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है।
- निषेध – महिलाएं इस दिन गेहूँ एवं चावल से निर्मित भोजन को ग्रहण नही करती हैं।
हलषष्ठी / कमरछठ / हलछठ
- जन्मोत्सव यह पर्व श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
- तिथि – हलषष्ठी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है, हलषष्ठी को हलछठ और कमरछठ भी कहा जाता है।
- व्रत – इस दिन माताएँ सूर्योदय से पूर्व उठकर महुआ पेड़ की डाली का दातून कर व स्नान करने के बाद संतान प्राप्ति व अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं।
- पूजा – दिन में महिलाएँ सामूहिक रूप से घर के आँगन या गाँव के चौपाल में बनावटी तालाब (सगरी ) बनाकर गौरी-गणेश तथा हलषष्ठी देवी की पूजा करती हैं।
- उपयोग वर्जित – चूँकि श्री कृष्ण गौ-पालन को महत्व देते हैं तथा बलराम जी का प्रमुख हथियार हल है। इसलिए इस व्रत में हल से जुते हुए स्थानों का अन्न व गौमाता के दूध, दही व घी आदि का उपयोग वर्जित है।
- प्रसाद – पूजन में पसहर चावल (बिना हल जुते हुए जमीन से उगा हुआ धान का चावल), छः प्रकार की भाजी की सब्जी (मुनगा, कद्दू, करेला आदि), भैंस का दूध, दही, घी, सेंधा नमक एवं महुआ के पत्ते का दोना आदि उपयोग किया जाता है।
- विशेष महत्त्व भाद्रपद की छठी को मनाने वाले इस पर्व में छः की संख्या का महत्व है। इस दिन छः प्रकार की भाजी, छः प्रकार के खिलौने, छः · · · · · · · प्रकार का अन्न वाला प्रसाद तथा हलषष्ठी देवी की छः कथा सुनी जाती है।
- विशेष रस्म पूजन के बाद माताएँ अपनी संतान के पीठ में पोता (हल्दी पानी से भिगाया हुआ कपड़े का टुकड़ा) मारकर अपने आँचल से पोछती हैं। यह माता के द्वारा दिया गया रक्षा कवच का प्रतीक होता है।
पोला
- तिथि – छत्तीसगढ़ के कृषकों का लोकप्रिय पर्व भाद्र माह के अमावस्या को मनाया जाता है।
- कामना – भादो माह में कृषक खेतों में बुआई, रोपाई एवं निंदाई के बाद बैलों के प्रति धन्यवाद अर्पित करते हैं।
- पशु श्रृंगार – बैलों का श्रृंगार कर उनकी पूजा करते हैं तथा उन्हें बाजरा से बनी खिचड़ी खिलाते हैं।
- छोटे-छोटे बच्चे मिट्टी के बैलों को सजाकर उनकी पूजा करते हैं तथा खिलौने के बैल को घर-घर लेकर जाते हैं, जिसके बदले उन्हें कुछ पैसे या उपहार दिया जाता है।
- महत्त्व – यह पर्व किसान और उसके मूक साथी के बीच के खूबसूरत रिश्ते को दर्शाता है।
- प्रतियोगिता – इस दिन बैल दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है।
- पोला विसर्जन- इस अवसर पर महिलाएँ मिट्टी के छोटे से घड़े (पोला) को परम्परागत रिवाजों के साथ विसर्जित करती हैं ।
- व्यंजन घर में विशेष प्रकार के पकवान बनाती हैं जैसे- खुरमी आदि ।
तीजा
- तिथि – भादो मास शुक्ल पक्ष तृतीय
- कामना इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी आयु व उत्तम स्वास्थ्य के लिए तथा अविवाहित युवतियाँ अच्छे वर की प्राप्ति के लिए बिना अन्न एवं जल ग्रहण किए हरतालिका तीज का व्रत रखती हैं।
- इतिहास – सर्वप्रथम माँ पार्वती ने अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने के लिए भगवान शिव के लिए यह व्रत रखा था। इस अवसर पर स्त्रियाँ अपने मायके जाती हैं तथा केले के पत्तों से मंडप बनाकर उसमें गौरी-शंकर की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना करती हैं।
- स्त्रियाँ रात्रि में भजन-कीर्तन करते हुए जगराता करती हैं तथा अगले दिन पूजन के पश्चात् व्रत तोड़ती हैं।
- व्यंजन – छत्तीसगढ़ में तीजा के अवसर पर ठेठरी बनाई जाती है।
नवरात्रि
- पौराणिक कथानुसार सर्वप्रथम श्रीरामचन्द्रजी ने समुद्र तट पर नवरात्रि की पूजा प्रारंभ की थी। रामजी दसवें दिन लंका के लिए प्रस्थान किए तथा विजय प्राप्त कर वापस आए।
- तब से लेकर आज तक क्वार माह में शुक्ल पक्ष की दशमी को “अधर्म पर धर्म की जीत” का यह पर्व दशहरा मनाया जाता है। दशहरे के दिन शस्त्र पूजा एवं रावण दहन का कार्यक्रम किया जाता है।
- आयोजन नवरात्रि का पर्व वर्ष में दो बार चैल एवं अश्विन माह के प्रतिपदा से नवमी तक पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
- पूजा नवरात्रि अर्थात् नौ रातें। अतः नवरात्रि के नौ रातों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है।
- विशेष महत्त्व – छत्तीसगढ़ अंचल में माँ दुर्गा के प्रतीक के रूप में माँ दंतेश्वरी, माँ महामाया, माँ विंध्यवासिनी आदि शक्ति रुपी देवियों की पूजा की जाती है।
दीवाली
- तिथि – यह पर्व कार्तिक अमावस्या को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
- इतिहास – इस दिन भगवान श्री राम लंका विजय कर अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात् अयोध्या लौटे थे। तब अयोध्यावासियों ने पूरे अयोध्या में घी के दिये प्रज्ज्वलित कर उनका स्वागत किया था।
- अवधि – इस 5 दिवसीय पर्व 1 ) धनतेरस 2 ) नरकचौदस 3) दीवाली 4) गोवर्धन पूजा 5) भाईदूज के अवसर पर दीवाली उत्सव के कुछ दिन पहले से ही घरों व दुकानों की सफाई कर उसे सजाया जाता है।
- घर के आँगन में रंगोली बनाया जाता है तथा रात्रि में दीपक जलाया जाता है।
- पूजा दीपावली की रात्रि को धन एवं समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है तथा पटाखे फोड़े जाते हैं।
गोवर्धन पूजा
- तिथि – गोवर्धन पूजा का पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को अर्थात् दीवाली के दूसरे दिन मनाया जाता है।
- पूजा इस दिन गोधन अर्थात देवी लक्ष्मी का स्वरूप “गौमाता” की पूजा की जाती है।
- गोवर्धन बदना – इस दिन गोबर से विशेष आकृतियाँ बनाकर उसे पशुओं के खुर से कुचलवाया जाता है तथा इस पवित्र गोबर का तिलक लगाया जाता है।
मातर
- तिथि मातर त्यौहार छत्तीसगढ़ के यादव (राउत) समुदाय द्वारा कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है।
- पूजा इस अवसर पर यादव जाति के लोग अपने कुलदेव “खोड़हर देव” (जो की लकड़ी के बने होते हैं) की पूजा करते हैं ।
- वेशभूषा पारम्परिक वेशभूषा में लाठियां हाथ में लेकर नृत्य करते हैं। · · · · |
देवउठनी एकादशी (जेठौनी)
- तिथि- कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवोत्थान एकादशी, प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी का त्यौहार मनाया जाता है।
- पूजा इस दिन मंदिरों व घरों में गन्नों का मण्डप बनाकर भगवान “लक्ष्मीनारायण जी” की पूजा की जाती है। भोग भोग के रूप में चने की भाजी, बेर व आँवला आदि अर्पित किया जाता है।
- विवाह – इस दिन मण्डप में तुलसी का पौधा एवं शालिग्राम की प्रतिमा रखकर गोधूलि बेला में उनका विवाह रचाया जाता है।
- मंडप निर्माण गन्ने से विवाह के लिए मंडप निर्माण किया जाता है ।
छेरछेरा तिथि
- अन्नदान का महापर्व छेरछेरा पौष पूर्णिमा को फसल काटने के बाद नई फसल के खलिहान से घर आने की खुशी मे मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही बच्चे, युवक-युवतियाँ घर-घर जाकर छेरछेरा (अन्न का दान) मांगते है तथा गीत गाते हैं- “छेरछेरा कोठी के धान ला हेरहेरा।
छत्तीसगढ़ में मितानी
- छत्तीसगढ़ी संस्कृति में मन और आत्मा के रिश्ते को अत्यधिक पवित्र माना गया है। यहां की सामाजिक परंपरा में छत्तीसगढ़ के कुछ विविध सांस्कृतिक धरोहर भी निहित हैं, जो अद्भुत और बेमिसाल हैं। मित्रता के लिए छत्तीसगढ़ में कुछ विशेष संबोधन के रिश्ते बनाए जाते हैं, जिसे वे आपस में ताउम्र निभाते हैं। इस रिश्ते की पराकाष्ठा इतनी है कि इन रिश्तों में बंधने के बाद आपस में एक-दूसरे को नाम से संबोधित भी नहीं करते । मिलता के रिश्तों में बंधे स्त्री-पुरुष, अपने मित्र पुरुष स्त्री के सामने नहीं आते या फिर स्त्रियां घूंघट रखकर आती हैं।
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