cg pramukh vyaktitva gk in hindi छत्तीसगढ़ कला के क्षेत्र के प्रमुख व्यक्तित्व cgpsc vyapam में इससे सवाल जरुर आता है
1. स्व. दाऊ दुलार सिंह मंदराजी
- जन्म – 1 अप्रैल 1910, ग्राम रवेली, राजनांदगांव
- मृत्यु – 24 सितंबर 1984
- छत्तीसगढ़ में ‘नाचा के भीष्म पितामह’ माने जाते हैं। ये संपन्न जमींदार परिवार से थे। नाचा के प्रोत्साहन हेतु इन्होंने ‘रवेली नाचा पार्टी’ (1927-28) की स्थापना की थी। इनकी नाचा पार्टी ने अंबिकापुर, राजनांदगांव, जगदलपुर एवं रायगढ़ तक चारों दिशाओं में अपना परचम फैलाया था।
- राज्य शासन द्वारा लोककला शिल्प के क्षेत्र में ‘दाऊ दुलार सिंह मंदरा जी’ सम्मान प्रदान किया जाता है। इन्होंने हबीब तनवीर के साथ काफी समय तक काम किया गया।
- इन्होंने नाचा के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को जीवन्त रखने और उसके समुचित संरक्षण के लिए अपना तन-मन-धन सम- र्पित कर दिया ।
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2. दाऊ रामचन्द्र देशमुख
- जन्म – दुर्ग के बघेरा गाँव में
- मृत्यु – 14 जनवरी 1998 छत्तीसगढ़ लोककला के उद्धारक, लोककला के मर्मज्ञ, सांस्कृतिक मंच के जन्मदाता, पुनर्जागरण के अग्रदूत, कला जगत के धूमकेतु आदि नामों से प्रसिद्ध |
- 1951 ई. में ‘देहाती कला’ मंच का गठन।
- 1971 ई. में ‘चंदैनी गोंदा’ नाचा पार्टी का गठन । रामचन्द्र देशमुख ने पुन्नालाल बक्शी की कहानी ‘कारी’ को 1983 में अभिनीत किया था जिससे इसकी ख्याति पूरे छत्तीसगढ़ अंचल में फैलने लगी थी।
3. दाऊ महासिंह चन्द्राकर-
- जन्म – 1917, आमदी, दुर्ग जिला
- छत्तीसगढ़ में ‘लोक कला के पुजारी’ ।
- इन्होंने नरेन्द्र देव वर्मा की रचना ‘सुबह की तलाश’ पर सोनहा बिहान नामक नाटक का मंचन किया, जो लोरिक चंदा गायन शैली पर आधारित है। आने वाली पीढ़ी के लोककलाकार केदार यादव, ममता चंद्राकर और कुलेश्वर ताम्रकार इस मंच की देन है।
4. राजा चक्रधर सिंह
- जन्म – 19 अगस्त 1905, रायगढ़ रियासत में ।
- ये उत्कृष्ट तबलावादक, कला पारखी और साहित्य प्रेमी थे। इसके साथ ही राजा चक्रधर सिंह का संबंध कत्थक नृत्य से है तथा इन्होंने कत्थक नृत्य के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया है। इनका ‘नर्तन सर्वस्व’ नामक ग्रंथ कत्थक पर आधारित है।
- नर्तक कार्तिकराम इनके परम शिष्य थे।
- यह भारत के प्रसिद्ध तबला वादक थे। सन् 1939 में राजा चक्रधर के तबला वादन से प्रभावित होकर तत्कालीन वायसराय ने इन्हे ‘संगीत सम्राट’ की उपाधि प्रदान की थी।
- राज्य के रायगढ़ जिले में इनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष गणेश चतुर्थी के अवसर पर ‘चक्रधर समारोह का आयोजन किया जाता है। इस समारोह में देश के शीर्षस्थ प्रतिष्ठित कला, संगीत एवं साहित्य साधकों और क्रीड़ा जगत की प्रख्यात प्रतिभागियों को आमंत्रित कर सम्मा- नित किया जाता है।
- प्रमुख रचनाएँ – रागरत्नमंजूषा, बैरागढ़िया, मायाचक्र, तालतोयनि- धि, नर्तन सर्वस्व आदि ।
5. हबीब तनवीर- छत्तीसगढ़ अस्मिता के प्रतीक ।
- जन्म – 1 सितंबर 1923, रायपुर।
- ये भारत के प्रसिद्ध पटकथा लेखक, नाट्य निर्देशक, कवि और अभिनेता थे।
- सन् 1954 में इन्होंने हिन्दुस्तान थियेटर (दिल्ली) में काम किया। सन् 1959 में स्थानीय लोक कलाकारों की सहायता से ‘नया थियेटर’ की स्थापना की।
- प्राप्त सम्मान- 1. संगीत नाटक अकादमी (1969) 2. पद्मश्री (1983) 3. पद्मभूषण (2002)
- प्रमुख नाटक – चरणदास चोर, आगरा बाजार, पचरंगी, कारतूस और माटी की गाड़ी आदि ।
6. तीजनबाई-
- जन्म – 24 अप्रैल 1956,
- गनियारी, भिलाई पंडवानी को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने में इनका अहम योगदान है। ये पंडवानी की कापालिक शैली की लोककलाकार हैं।
- इन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर अनेक अतिविशि-
- लोगों के समक्ष देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन किया है।
- छत्तीसगढ़ में पारम्परिक तौर पर पण्डवानी की वेदमती शैली ही प्र- चलित रही है इस शास्त्र सम्मत शैली से अलग कापालिक शैली को लोकप्रिय बनाने का श्रेय तीजनबाई को जाता है।
- प्राप्त सम्मान- 1. पद्मश्री (1987) 2. पद्म भूषण (2003) 3. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995) 4. फुकुओका पुरस्कार (2018) 5. पद्म विभूषण (2019) 6. संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप (2022)
- प्रस्तुति – 1. 1985, भारत महोत्सव (फ्रांस) 2. 1990, फ्रांस महोत्सव (फ्रांस) TM 3. मॉरीशस, जर्मनी, तुर्की, साइप्रस, माल्टा, स्विट्जर लैंड अनेक देशों में पाण्डवानी को पेश किया।
7. सुरुजबाई खाण्डे
- जन्म – 1949, बिलासपुर
- ये भरथरी, चंदैनी गोंदा, ढोलामारू की गायिका है। साथ ही आल्हा और निर्गुण मार्ग के भजनों ने भी इन्हें विशेष ख्याति दिलाई।
- प्राप्त सम्मान- 1. अहिल्या बाई सम्मान, मध्यप्रदेश (2000-01) 2. दाऊ रामचन्द्र देशमुख और स्व. देवदास बंजारे स्मृति पुरूस्कार 3. इन्हें हबीब तनवीर ने अपनी मंडली में शामिल करते हुए अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों में स्थान दिलाया।
8. रितुवर्मा
- जन्म – 1977 ई., रुआबाँधा, भिलाई (दुर्ग)
- पंडवानी की वेदमती शैली की गायिका ।
9. झाडू राम देवांगन
- जन्म – 1927 ई., भिलाई के समीप बासिन गाँव
- ये छत्तीसगढ़ में पण्डवानी वेदमती शैली के गुरू कहे जाते है।
- इनके शिष्यों में पूनाराम निषाद (दुर्ग जिले के रिंगनी गांव के निवासी है), चेतनराम, तीजनबाई और प्रभा यादव पंडवानी की साधना में लगे है।
- इन्होंने देश में ही नही बल्कि फ्रांस, जर्मनी, इटली और इंग्लैण्ड जैसे यूरोपीय देशों में भी अपनी प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली।
10. स्व. देवदास बंजारे
- जन्म – 1 जनवरी 1947, सांकरा ग्राम, धमतरी
- इन्होंने छत्तीसगढ़ी पंथी लोकनृत्य को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने में योगदान दिया ।
- 1985 ई., फ्रांस में पहली बार आयोजित भारत महोत्सव और 1990 के फ्रांस उत्सव में इन्होंनें वहां के अनेक शहरों में अपने दल के साथ प्रस्तुति दी।
- ये अपने जीवन का आदर्श गुरू घासीदास को मानते है । इन्होंने हबीब तनवीर की नाट्य मंडली नया थियेटर से जुड़कर अपनी कला को एक ऊँचाई दी ।
11. मंजुला दास गुप्ता
- जन्म – 2 फरवरी 1929
- ‘छत्तीसगढ़ की लता’ के नाम से प्रसिद्ध है।
12. पं. कार्तिक राम
- जन्म – 1910 ई., बिलासपुर
- रायगढ़ घराना के कत्थक नर्तक ।
13. लक्ष्मण मस्तुरिया-
- जन्म – 7 जून 1949, मस्तुरी, बिलासपुर
- ये मूलतः छत्तीसगढ़ के गीतकार थे।
- इन्होंने कई छत्तीसगढ़ी गीतों की रचना की और उन्हें अपनी मधुर आवाज में गाया।
- इन्होंने प्रदेश के अनगिनत कवि सम्मेलनों में अपने गीत का प्रस्तुती- करण दिया, जिसके कारण इन्हें ‘छत्तीसगढ़ का जनकवि व माटीपूत कहा जाता है।
- छत्तीसगढ़ी निबंध – माटी कहे कुम्हार से
- प्रमुख कृतियाँ- मोर संग चलव रे, मैं छत्तीसगढ़ियां अंव रे, गंवई गंगा, हमू बेटा भुइंया के आदि ।
14. फिदाबाई मरकाम
- जन्म – 1944 ई., बघिया टोला, डोंगरगढ़ के समीप (छत्तीसगढ़)
- 1988 में मध्यप्रदेश शासन का ‘तुलसी सम्मान’ ।
- हबीब तनवीर व दाऊ मंदराजी के मंचन में अभिनय ।
- इन्होंनें नाचा में अपनी विशेष पहचान बनाने के बाद रंगमंच में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। नाटक – चरणदास चोर, मोर नांव दमांद मोर गावं के ससुराल, बहादुर कलारिन, मिट्टी की गाड़ी और आगरा बाजार में अभिनय का प्रदर्शन किया।
15. पं. अमृतलाल दुबे
- जन्म – 1925 ई., बिलासपुर
- ‘तुलसी के बिरवा जगाय’ नामक कृति पर इन्हें मध्यप्रदेश शासन का प्रथम ‘इसुरी पुरस्कार’ प्राप्त हुआ था।
16. बद्री विशाल परमानंद-
- जन्म – 1 जुलाई 1927, छतौना, रायपुर।
- ‘का तै मोला मोहनी डार दिये’ व ‘गोंदाफूल’ गीत के रचयिता एवं प्रसिद्धि ।
17. मुरली चन्द्राकर
- जन्म – अप्रैल 1931,
- दुर्गपुष्पांजली कैसेट (बम्बई में रिकॉर्ड)’
- जिनगी
- के नई हे ठिकाना’ व ‘पैरी बैरी ला’ गीत के रचयिता एवं प्रसिद्धि।
18. रवान यादव-
- जन्म – दुर्ग लोक कला के क्षेत्र में प्रमुख योगदान।
20. भैय्यालाल हेडाऊ
- जन्म – 1933, राजनांदगांव
- गायन, अभिनय एवं उद्घोषणा कला में पारंगत।
20. अनूपरंजन पाण्डेय-
- जन्म – 21 जुलाई 1965, बिलासपुर।
- इनके द्वारा “बस्तर बैंड” तैयार किया गया है।बस्तर बैंड बस्तर की कला-संस्कृति, मिथ और उत्पत्ति की कथाएं तथा बस्तर की विलुप्त होती परम्पराओं को संजोए रखने का एक प्रयास है।
- नया मंच में बतौर नायक भारत, इंग्लैण्ड एवं स्कॉटलैण्ड में नाटकों का प्रदर्शन।
- 2019 में पद्मश्री से सम्मानित।
- संगीत नाटक अकादमी में छत्तीसगढ़ से सदस्य के रूप में शामिल।
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