छत्तीसगढ़ जनजातीय शिल्पकला सामान्य ज्ञान

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On: June 7, 2026
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मिट्टी कला (आदि शिल्प)

  • मिट्टी कला प्राचीनतम् शिल्पकला है।
  • मनुष्य ने सर्वप्रथम मिट्टी को आकार दिया और यहीं आकार उसका प्रथम शिल्प बना।
  • आदिवासी अपने दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुओं जैसे मटका, कलश, दिया, बर्तन, लक्ष्मी, गणेश तथा देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ, पशु-पक्षी, रथ आदि का कलात्मक रूपाकार मिट्टी से बनाते है।
  • परंपरागत रूप से मिट्टी का कार्य कुम्हार करते हैं। छत्तीसगढ़ में रायगढ़, सरगुजा तथा राजनांदगांव का मिट्टी शिल्प प्रसिद्ध है।
  • बस्तर का ‘टेराकोटा’ प्रसिद्ध मिट्टी शिल्प है, इस शिल्प के चार प्रमुख केन्द्र है- 1. नगरनार 2. कुम्हारपार (कोण्डागांव) 3. नारायणपुर 4. एड़का
  • टेराकोटा कला में मिट्टी से धार्मिक प्रतीकों तथा जीवन एवं प्रकृति से जुड़ी वस्तुओं की आकृति बनायी जाती है।

काष्ठ शिल्प

  • लकड़ी में विभिन्न रूपाकारों को उतारने की कला काष्ठ शिल्प कहलाती है।
  • यह छत्तीसगढ़ में विशेषकर माड़िया और मुड़िया जनजाति के द्वारा की जाती है।
  • बस्तर का काष्ठ शिल्प विश्व प्रसिद्ध हैं। मुरिया जनजाति के युवागृहों (घोटुल) के खम्भे, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, झले, मृतक स्तंभ आदि इसके उत्कृष्ठ उदाहरण है।
  • इसके अलावा कोरकू जनजाति के मृतक स्तंभ तथा सरगुजा की अनगढ़ मूर्तियाँ, पण्डो एवं कंवर जनजाति के विवाह स्तंभ भी काष्ठशिल्प के नमूने है।

बांस शिल्प

  • बांस से जीवनोपयोगी वस्तुएँ, सजावटी सामान आदि बनाया जाता है।
  • कमार जनजाति का मुख्य व्यवसाय बाँस शिल्प है। बस्तर एवं गरियाबंद बांस शिल्प के लिए प्रसिद्ध है।
  • कंघी कला
  • कंघी बनाने का श्रेय विशेष रूप से बंजारा जाति को दिया जाता है।
  • जनजाति जीवन में कंघियाँ सौन्दर्य एवं प्रेम का प्रतीक माना जाता है, बस्तर में कंघी प्रेम विशेष उल्लेखनीय है। · · ·
  • छत्तीसगढ़ की मुरिया जनजाति कंघियों में अनेक रूपों के सुन्दर अलंकरण के साथ ही रत्नों की जड़ाई एवं मीनाकारी करने में सिद्धहस्त हैं।
  • जगदलपुर के मानव संग्रहालय में कंघी कला के सुंदरतम् दृश्य आज भी देखे जा सकते हैं।

पत्ता शिल्प

  • पत्तों से झाड़ू तथा छिंद के पत्तों से चटाई आसन, खिलौने, सजावटी वस्तुएँ, दूल्हा-दुल्हन के मोढ़ आदि बनाए जाते हैं।
  • पत्ता शिल्प के कलाकार मूलतः झाडू बनाते हैं।
  • पनरा जाति के लोग छींद के पत्तों का कलात्मक उपयोग करते हैं। बस्तर, सरगुजा, रायगढ़, राजनांदगाँव में पत्ताशिल्प विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
  • जनजातीय क्षेत्रों में सरगी, सियाड़ी तथा पलाश के पत्तों से पत्तल एवं दोना बनाये जाते हैं तथा आम के पत्तों का उपयोग कलश में रखने एवं तोरण बनाने में किया जाता है।

प्रस्तर शिल्पकला

  • बस्तर का चित्रकोट क्षेत्र प्रस्तर के लिए विशेष प्रसिद्ध है।
  • इस क्षेत्र में बेजान पत्थरों को तराशकर आकर्षक आकृतियाँ, सजावटी सामान एवं मूर्तियाँ बनायी जाती है।
  • लौह शिल्प बस्तर के लोहार लोहे से कृषि उपकरण, झूले, देवी-देवताओं तथा पशु- पक्षियों की मूर्तियाँ आदि बनाने में निपुण हैं।
  • बस्तर के लोहार श्रेष्ठ शिल्पकारों में से एक है।
  • इन्हें इस कार्य के लिए कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

धातु कला

  • छत्तीसगढ़ का जनजातीय जीवन धातु मूर्तिकला के क्षेत्र में प्रख्यात है, छत्तीसगढ़ में धातुओं को शिल्पकला में परिवर्तित करने का कार्य निम्नलिखित जातियाँ करती हैं-

जाति स्थान

  • 1. मलार सरगुजा
  • 2. झारा रायगढ़
  • 3. घड़वा बस्तर

1. घड़वा कला- बस्तर क्षेत्र में भ्रष्ट मोम तकनीक का उपयोग करके धातुओं (पीतल, कांस्य) की ढलाई करके विभिन्न आकृतियाँ बनाने की कला को घड़वा शिल्प कहा जाता है।

  • घड़वा शिल्प में देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, त्योहारों में प्रयुक्त होने वाले यंत्रों तथा अन्य वस्तुओं की आकृतियाँ बनाई जाती हैं। बस्तर की कसेर जाति के लोग घड़वा कला के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किए गए प्रमुख घड़वा शिल्पकार निम्नलिखित हैं- श्री पदुम, सुखचंद बघेल, जयदेव बघेल, मानेक घड़वा आदि।

झारा कला

  • रायगढ़ जिले के एकताल गांव के झारा शिल्पकार धातु मूर्ति कला के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है, जो विभिन्न प्रकार की मूर्ति तथा आभूषण आदि कलाकृतियों का निर्माण करते हैं।
  • इस समुदाय के प्रमुख कलाकार गोविंदराम झारा, रामलाल झारा । तीर-धनुष कला वन्य जाति के लोग शिकार हेतु तीर-धनुष का निर्माण स्वयं करते हैं।
  • बस्तर के मुरिया आदिवासी धनुष पर लोहे की गरम सलाख या कुल्हाड़ी से कलात्मक अलंकरण बनाते हैं।

रजवार शिल्प

  • सरगुजा जिले के रजवार जाति के लोग खिड़कियों की जालियाँ बनाने के लिए प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त वे सजावटी वस्तुएं जैसे- शुभ सूचक, दीप, पशु-पक्षियों आदि की कलाकृतियाँ सफेद मिट्टी एवं स्थानीय रंगों से बनाते है।

तुम्बा शिल्प

  • सूखे तुम्बे का उपयोग लैंप, पानी की बोतलें और “बीन” बनाने के लिए किया जाता है। लाल गर्म लोहे की छड़ की मदद से उन पर कलात्मक डिजाइन उकेरते हैं। यह शिल्प बस्तर क्षेत्र में प्रचलित है।

कोरन्डम शिल्प

  • उन्हें गहनों में इस्तेमाल करने के लिए काटा और पॉलिश किया जाता है। यह शिल्प बस्तर क्षेत्र में प्रचलित है।

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